ग्लोगी जल विद्युत परियोजना को 113 साल पूरे हो चुके है। यह परियोजना उत्तराखंड के क्यारकुली व भट्टा गांव के बीच स्थित है। आश्चर्य की बात यह कि यहां की मशीनें बूढ़ी तो हो गईं, लेकिन उनके ऊर्जा उत्पादन की क्षमता में कोई कमी नहीं आई है। उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड अब इस परियोजना की देखभाल किसी धरोहर की तरह करता है। क्योंकि, आने वाले वर्षों में इसे संरक्षित कर पर्यटकों के लिए भी खोला जा सकता है। 1909 से लगातार सेवा में है परियोजना । 1904 में इस योजना पर 07 लाख,29 हजार, 560 रुपये का खर्चा कर निर्माण कार्य को स्वीकृति दी गई थी।

ब्रिटिश सेना के अधिकारी कैप्टन यंग 1825 में मसूरी पहुंचने वाले पहले गैर भारतीय बताए जाते हैं। यहां की खूबसूरती और प्राकृतिक नजारों की वजह जल्द ही यह क्षेत्र अंग्रेजों की पसंदीदा जगह बन गई। 1901 तक यहां की जनसंख्या 6,461 थी, जो गरमी के मौसम में 15,000 तक पहुंच जाती थी। इस दौरान यहां पीने के पानी की समस्या होने लगी तो अंग्रेजों ने वर्ष 1890 में यह जल विद्युत परियोजना के निर्माण का खाका तैयार किया। इसके बाद मसूरी-देहरादून मार्ग पर भट्टा गांव से करीब तीन किमी दूर ग्लोगी में जल-विद्युत परियोजना के लिए जमीन तलाशी गई। यह जगह इसलिए चुनी गई कि एक तो यह मसूरी से करीब था, जिसे पीने के पानी से लेकर बिजली की सप्लाई आसानी से हो सकती थी।

उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड के जनसंपर्क अधिकारी विमल डबराल बताते हैं कि पुराने अभिलेखों के अनुसार इस जल विद्युत योजना को अंग्रेजी सरकार के समक्ष स्वीकृति के लिए 1904 में प्रस्तुत की गई। तब इसकी लागत 7 लाख 29 हजार 560 रुपये आंकी गई थी। मई 1909 में ग्लोगी पावर हाउस ने अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करना शुरू कर दिया था। 24 मई 1909 एम्पायर डे के अवसर पर ग्लोगी पावर हाउस से पैदा हुई बिजली से पहली बार मसूरी में बिजली के बल्ब रोशन हुए। इस परियोजना के रखरखाव की जिम्मेदारी तब मसूरी नगर पालिका को दी गई थी। जो तब चार आना प्रति बीटीयू के हिसाब से नागरिकों को बिजली देती थी