उत्तराखंड में सभी 70 सीटों पर क्यों लड़ना चाहती है आम आदमी पार्टी ? खस बातचीत पर एक रिपोर्ट।



उत्तराखंड अलग राज्य बनने से लेकर अब तक केवल राजनीति का शिकार हुआ है। राज्य को परिभाषित करने वाला पहाड़ी क्षेत्र अलग राज्य बनने के बाद से लगातार पिछड़ता गया है। जबकि राज्य में 60% से अधिक भूभाग पहाडी क्षेत्र का है। लेकिन बदकिस्मती ऐसी है कि विकास न कुमाऊँ पहाडी क्षेत्र क्षेत्र का हुआ और न गढ़वाल पाहाडी क्षेत्र का। मैदानी भाग जो कि महज 40% ही है उसमें भी बामुश्किल 20-25% क्षेत्र का ही विकास हुआ, वो भी पूर्ण रूप से विकास कहलाने लायक नही है। उदाहरण के लिए उत्तराखंड की राजधानी देहरादून को ही ले लीजिए। देहरादून का विकास अगर शिक्षा, स्वास्थ्य को लेकर देखा जाए तो हुआ है, लेकिन रोजगार के लिए देहरादून में कितनी इंडस्ट्री स्थापित हुई ? इस पर कोई सवाल आज भी नही है। पहाड़ो पर तो शिक्षा और स्वास्थ्य भी शून्य की तरफ बढ़ रही है। सरकारी स्कूलों के हालात ऐसे हैं कि कक्षा आठ तक के स्कूलों में 10 बच्चे भी बामुश्किल ही दिख रहे हैं। और बारहवीं तक के स्कूलों में कहीं 80 बच्चे हैं तो कहीं 100, वो भी केवल उन स्कूलों में जो कक्षा छह से लेकर बारहवीं तक चल रहे हैं। 

विकास के नाम पर जो किया उससे भी उत्तराखंड के लोगों को ही लूटा:- विकास के नाम पर आज राज्य में एक शराब है और दूसरा पर्यटन। शराब ने लोगों को जीते जी नरक में धकेल दिया लेकिन सरकारें है कि पाहाडी क्षेत्र में ठेकों के लाइसेन्स बाटने पर लगी रही । पर्यटन के नाम पर टिहरी जैसे पौराणिक शहर को बरवाद किया गया और बदले में लोगों को 4 से 5 रुपये प्रति यूनिट बिजिली का भी वसूला गया। हालांकि पहाड़ी क्षेत्र में बिजली की दर 2.50 से 3 रुपये रखी गई, लेकिन सवाल तो यही है कि क्यों ? राज्य में 25 से अधिक छोटे बड़े बांध खड़े हैं। पूछो किसकी छाती पर ? लगभग 80% से अधिक सब पहाड़ी क्षेत्र में, लेकिन फिर भी बिजली का पैसा भी पहाड़ी ही दे। 

अब इन्ही सब मुद्दों को आम आदमी पार्टी ने अपना उद्देश्य बनाया है। पार्टी चुनाव जितने के बाद क्या करेगा और क्या नही करेगी, ये तो वक्त ही बतायेगा लेकिन आम आदमी पार्टी ने शिक्षा के लिए जो कार्य दिल्ली के अंदर किया उसकी सराहना होनी भी चाहिए। उत्तराखंड आम आदमी पार्टी अध्यक्ष दिनेश मोहनिया ने कहना है कि उत्तराखंड में रोजगार की कमी से पैदा हुआ पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और सरकारी स्कूल कॉलेजों में अच्छी शिक्षा का अभाव तीन प्रमुख समस्याएं हैं, जिससे दिल्ली की तर्ज पर निपटा जाएगा। राज्य में आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अनियंत्रित विकास, अवैध कब्जे, भ्रष्टाचार और प्रकृति से खिलवाड़ जैसे मुद्दों पर पार्टी मुखर रहेगी। दिल्ली की तर्ज पर उत्तराखंड में भी जनता के सहारे चुनाव लड़ा जाएगा और जनता ही पार्टी के लिए पैसा और वोट मांगेगी। 

पार्टी ने 70 सीटों पर सुनाव लड़ने का फैसला क्यों लिया ? 

दरअसल पार्टी का बयान अब आया है लेकिन पार्टी के कार्यकर्ता लगातार जन सम्पर्क में थे, दून में पत्रकारों से बातचीत करते हुए पार्टी के प्रदेश प्रभारी दिनेश मोहनिया ने उनकी इस घोषणा को दोहराया। सर्कुलर रोड स्थित पार्टी कार्यालय में मोहनिया ने कहा कि 20 साल तक भाजपा और कांग्रेस के शोषण का शिकार हुई जनता अब आम आदमी पार्टी को तीसरे विकल्प के रूप में देख रही है। आम आदमी पार्टी का विश्वास इसलिए भी मजबूत हुआ है क्योंकि पार्टी की ओर से कराए गए सर्वेक्षण में 62 फीसदी लोगों ने पार्टी को चुनाव लड़ने की आवश्यकता जताई है। यही वजह है कि पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। 


पार्टी अध्यक्ष दिनेश मोहनिया ने साफ कहा है कि अगर आम आदमी की सरकार आई तो शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत सुविधाओं के लिए पहाड़ी क्षेत्र में पार्टी काम करेगी। पार्टी को उत्तराखंड के कुमाऊँ से काफी अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। गढ़वाल क्षेत्र में भी पार्टी लगातार जन सम्पर्क में है और उम्मीद है कि लोग 2022 में विकास के लिए वोट करेंगे, ऐसा पार्टी अध्यक्ष का मानना है।

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