संघर्ष की ये है कहानी, पहाड़ों पर कैसे ठहरेगी जवानी । बदहाल व्यवस्था और बेरोजगारी ! यही है हर पहाड़ी भाई की लाचारी ।

 

राज्य में पहाड़ी सड़कों की स्थिति किसी से छिपी नही है। कच्ची सड़कों पर सवारियों से भरी गाड़ी कैसे हिचकोलों के साथ आगे बढ़ती है ये सिर्फ स्थानीय व्यक्ति ही जानता है। सरकार को याद आ गई तो चार-पांच साल में डामरीकरण का कार्य करवा देती है, नही तो सड़के जिस हाल में हैं लोग वैसे ही सफर कर रहे हैं। भले ही सरकारें विकास के लाख दावे कर लें, लेकिन आज भी गांवों में रहने वाले लोग ही अपने लोगों की जान बचाने के लिए देवदूत बनकर खडे होते हैं। दशोली विकासखंड के मेड़ ठेली गांव में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। चमोली जिले में लगातार हो रही बारिश से कई ग्रामीण सडकें बंद हैं। इससे गांवों की आवाजाही प्रभावित हुई है। बीते दिनों आई बारिश से दशोली विकासखंड के मेठ ठेली गांव को यातायात सुविधा से जोड़ने वाली सड़क कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हो गई। दो सप्ताह से ग्रामीण इस सड़क को खोले जाने का इंतजार कर रहे हैं। आपदा की दृष्टि से थराली विधानसभा का यह सबसे संवेदनशील क्षेत्र भी है।

सड़क बंद होने के कारण बीमार और घायलों को सड़क तक लाने में युवाओं को मशक्कत करनी पड़ रही है। बीते दिन ठेली गांव के 51 वर्षीय बलवीर सिंह रावत को पैर में चोट लगने से वह घायल हो गए। वह चलने की स्थिति में नहीं थे। क्षेत्र पंचायत सदस्य राहुल सिंह का कहना है कि सड़क बंद होने के कारण कई वाहन गांव में ही फंसे हुए हैं। बीमार और बुजुर्गों को अस्पताल तक पहुंचाने में जोखिम भरे रास्ते दिक्कत पैदा कर रहे हैं। बताया कि प्रशासन को अवगत कराने के बाद भी सड़क न खोला जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। थराली की विधायक मुन्नी देवी का कहना है कि प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि दो दिनों के भीतर बरसात के दौरान भूस्खलन से क्षतिग्रस्त सड़कों को हर हाल में खोला जाए।

सरकारें शहरी सड़को और हाइवे को खुलवाने के लिए ठीक ठाक पैसा खर्च करती आई हैं लेकिन पहाड़ी क्षेत्रके आज भी अगर कोई सड़क बन्द हो जाती है तो कोई खबर लेने वाला नही है। थक हार के स्थानीय लोग ही सड़क से मलवा हटाते हैं और किसी तरह गाड़ी को निकलने के लिए जगह बनाते हैं। ऐसा नही है कि ये समस्या वर्ष दो वर्ष से चल रही है, इसको वर्षों वर्ष बीत गए हैं। न जाने कितनी ही माताओं बहनों ने प्रसव पीड़ा में पगडंडियों में ही दम तोड़ दिया और कितनो से रास्तों पर ही बच्चों को जन्म दे दिया। कोई गिनती नही, बस अब कोई कोई मामला इस लिए उजागर हो जाता है कि संचार के लिए सोशल मीडिया एक बड़ा प्लेट फॉर्म बन गया है। फिर भी राज्य के हुक्मरानों को इतनी भी शर्म नही आती कि उन बातों पर गौर किया जाए और निस्तारण हेतु कदम उठाए जाए। राज्य में पहाड़ी क्षेत्रो में रोपवे आपातकाल के लिए एक अच्छा विकल्प बन सकता था लेकिन किसी भी नेता में इतना विवेक कहाँ है कि वो इन सब बातों पर सोचे। नेताओं को तो ये सोचने से फुर्सत नही है कि केंद्र से जो बजट आ रहा है उसको कैसे ठिकाने लगाना हैं।

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