उत्तराखंड के टिहरी में बांध परियोजना के चलते एक भरे पूरे गांव को विस्थापन करना पड़ा था। पुरानी टिहरी अपने आप में ऐतिहासिक शहरों में सुमार था। 1815 से लेकर 1949 में राज्य के विलय होने तक शासन पुरानी टिहरी से ही चलता रहा। शहर कई ऐतिहासिक यादगारों की निशानी भी रहा, राजा कृतिशाह के वक्त में शिक्षा के लिए किए गये अभूतपूर्व कार्यों के सर्वश्रेष्ठ योगदान के लिए भी पुरानी टिहरी एक केंद्र रहा। स्वाभाविक है, जहां राजकाल इतने लंबे समय रहा उस जगह का विकास भरपूर हुआ होगा। यही वजह थी कि सरकार को पुरानी टिहरी के लोगों को अच्छे शहरों में बसाना पड़ा। इनमे से लोगों के पास तीन विकल्प रखे गए थे । ऋषिकेश, देहरादून और हरिद्वार, लेकिन कुछ समीपवर्ती परिवार जिनके घर जलाशय डूबक्षेत्र के समीप पहाड़ी पर थे, को नई टिहरी में बसाया गया। 

ऋषिकेश और हरिद्वार में टिहरी बांध विस्थापितों के नौ गांवों को बृहस्पतिवार को राजस्व ग्राम घोषित कर दिया गया। देहरादून जिले के बांध विस्थापित क्षेत्र पशुलोक के सात गांवों तथा हरिद्वार जिले के दो गांवों टिहरी विकास नगर एवं टिहरी बन्द्राकोटी को राजस्व ग्राम घोषित किया गया है । राजस्व ग्राम घोषित होने से इन क्षेत्रों के निवासियों को भी अब सभी सरकारी योजनाओं का लाभ और ग्राम पंचायतों का गठन जैसी सुविधाएं मिल जाएंगी । इस संबंध में सचिव (राजस्व) सुशील कुमार ने अधिसूचना जारी कर दी है। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने इन गांवों के निवासियों की वर्षों पुरानी मांग पर पिछले माह स्वीकृति दे दी थी । अधिसूचना में राजस्व ग्राम बनाये गये इन गांवों, मालीदेवल, विरयाणी पैंदार्स, असैना, लम्बोगड़ी गोजियाड़ा, सिरांई, सिरांई राजगांव, डोबरा, टिहरी विकास नगर एवं टिहरी बन्द्राकोटी, का क्षेत्रफल व नक्शा भी अधिसूचित किया गया है। 

नई टिहरी में बसाए गये लोगों को भी अच्छे से बसाने की योजना बनाई गई। पूरा शहर जैसा माहौल देने की कोशिश की गई। नई टिहरी भी दृश्य में बहुत खूबसूरत लगता है। लेकिन कुछ स्थानीय लोगों से खास बातचीत में पता चला है कि सरकार ने अपने बहुत से वादे पूरे नही किए, जिनके लिए स्थानीय लोग बार बार मांगे करते रहते हैं। वहीं लोगों की एक माग यह भी है कि झील में डूबा हुआ राजा का दरबार आज भी वैसा ही खड़ा है। जब झील में पानी कम होता है तो लोग उसके ऊपरी भाग को देखकर अपनी पुरानी यादें ताजा करते हैं। यइस विषय पर बात करते करते कई बार लोगों की आंखों से आँशु भी छलक आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए राजदरबार का संरक्षण कर म्यूजियम बनाना चाहिए, जिससे आने वाली पीढियां उसका अवलोकन कर सकें।