दिल्ली के बाद उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी ने सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। आम आदमी पार्टी के इस फैसले के बाद बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किलें बढ़ गई है। गौरतलब है कि दिल्ली में बीजेपी की खरीद-फरोख्त के बाद भी मोदी मैजिक नही चल पाया था। आम आदमी पार्टी के आगे बीजेपी तिनके की तरह उड़ गई थी। हालांकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने पूर्व से कार्य किया हुआ था। दूसरा उत्तराखंड और दिल्ली की भौगोलिक व आर्थिक स्थिति में जमीन आसमान का फर्क भी है। उत्तराखंड में वादपुर्ति करना किसी चुनौती से कम नही है। ऐसे में केवल घोषणाओं के दम पर चुनाव जितना इतना आशान कार्य नही है।

राज्य में अभी तक आम आदमी की तरफ से मुख्यमंत्री का चेहरा भी साफ नही है। लेकिन आम आदमी की दावेदारी में दम जरूर नजर आ रहा है। पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल का कहना है कि विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला सोच समझ के लिया गया है। उनका कहना है उत्तराखंड पहाड़ी क्षेत्र के लोग उनसे दिल्ली में मिले थे और उन्होंने ही उत्तराखंड से चुनाव लड़ने का सुझाव रखा था। जिसके बाद पार्टी ने उत्तराखंड में सर्वे करवाया और 62 फीसदी लोगों ने सहमति प्रदान की थी।


आम आदमी के राज्य में आ जाने से कांग्रेस बौखलाई हुई है। क्योंकि आम आदमी की नजर कोंग्रेस से नाराज चल रहे विधायकों पर भी गड़ी हुई है। दूसरा लोगों का रुझान आम आदमी पार्टी की तरफ जाता देख खेल खराब होने की आशंका बनी हुई है। राज्य की जनता बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकाल को देख चुकी है, ऐसे में लोग एक नई पार्टी को मौका देना चाहते हैं। यही वजह है कि आम आदमी पार्टी को कुमाऊँ में अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। वैसे भी बीजेपी और कांग्रेस ने राज्य की शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार के लिए कोई सुदृढ कदम नही उठाए। बीजेपी से लोगों को बहुत आश थी लेकिन बीजेपी ने राज्य को बेच खाया। जनता को गुमराह किया गया और पहाड़ी क्षेत्रों को तबाह करने का षड्यंत्र रचते हुए बीजेपी ने युवाओं का भविष्य भी दाव पर लगा दिया। आज जो रुझान है उससे बीजेपी राज्य में दोबारा आने की स्थिति में बिल्कुल नही है। हाँ, अगर कोई दूसरी पार्टी पूर्ण बहुतम के साथ नही आई तो बीजेपी गठबंधन की भूमिका में नजर आ रही है। दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस की चिंताएं इसी लिए बढ़ी हुई हैं क्योंकि आम आदमी के आने से बीजेपी का नही बल्कि कांग्रेस पार्टी का ज्यादा वोटर प्रभावित होगा। जबकि बीजेपी ने अंदरूनी खरीद-फरोख्त शुरू कर दी है और ग्राम पंचायतों में पार्टी सदस्यता बॉटनी शुरू कर दी है।