कोरोना काल में राज्य लौट युवा तो स्वरोजगार के रास्ते पर चलने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, मगर बैंक उनकी राह में रोड़ा बन रहे हैं। कोरोनाकाल में जिला उद्योग केंद्र ने स्वरोजगार शुरू करने के लिए आए जितने भी आवेदन ऋण स्वीकृत करने के लिए बैंकों को भेजे, उनमें से 25 फीसद से भी कम स्वीकार किए गए। इसको गंभीरता से लेते हुए मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है, जो इस बात की जांच करेगी कि बैंकों ने आवेदन किन कारणों से निरस्त किए।

राज्य में रोजगार ले लिए उचित प्रबन्ध न होने की स्थितिके सरकार ने घर लौटे युवाओं को स्वरोजगार करने की सलाह दी थी । इसके लिए सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में ऋण देने का आश्वासन भी दिया था । इस उद्देश्य के साथ इसी वर्ष अप्रैल में मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत देहरादून जनपद से सैकड़ों युवा अब तक स्वरोजगार अपनाने के लिए जिला उद्योग केंद्र में आवेदन कर चुके हैं। केंद्र ने जांच समेत अन्य प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद बीते दिनों इनमें से 284 आवेदन बैंकों को ऋण स्वीकृत करने के लिए भेज दिए। लेकिन, इनमें से अब तक केवल 74 आवेदक का ऋण ही स्वीकृत किया गया है। बाकी के 42 आवेदन निरस्त कर दिए गए और 26 वापस भेजे गए हैं। अन्य 55 आवेदन की अभी जांच चल रही है।


जबकि मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत निर्माण क्षेत्र में 25 लाख और सेवा क्षेत्र में अधिकतम 10 लाख का प्रोजेक्ट लगाने के लिए ऋण दिया जाता है। इसमें 15 से 25 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलती है। प्रदेश में कोई भी इस योजना का लाभार्थी बनने के लिए वेबसाइट rmsy.uk.giv.in पर ऑनलाइन आवेदन कर सकता है। लेकिन बैंकों की स्थिति देखकर लगता है कि बैंक सरकार की पकड़ से या तो बाहर हो गए हैं या फिर बैंक कंगाल हो गए है। इसमें देखा जाए तो बैंक भी जिम्मेदार नजर नही आते हैं, क्योंकि सरकार बिना किसी आँकलन के कोई भी निर्णय कैसे ले सकती है। केंद्र से मिलने वाली 25-33% सहायता राशि से थोड़ी कोई योजना बन सकती है। पहाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रोजेक्ट पर कार्य करना शहरी क्षेत्र जितना सहज नही होता है। बैंकों की सही स्थिति के आँकलन के बिना ही राज्य सरकार ने लोन की घोषणा तो करदी लेकिन उसका परिणाम पहले से सुनिश्चित था जो आज नजर आ रहा है।