उत्तराखंड सरकार द्वारा नदियों पर झीलें बनाने का निश्चय किया गया है। इससे जल संरक्षण तो होगा ही, अच्छा-खासा राजस्व भी प्राप्त होगा। यह झीलें संबंधित क्षेत्रों के निवासियों के हलक तर करने का जरिया भी बनेंगी, जिससे भूजल के बेतहाशा दोहन पर अंकुश लग सकेगा। प्रथम चरण में इस पहल को कोटद्वार क्षेत्र की खोह नदी में धरातल पर उतारने की कसरत शुरू की गई है। खोह नदी पर बनने वाली दो झीलों में साढ़े चार करोड़ लीटर पानी इकट्ठा होगा। साथ ही इनसे प्रतिवर्ष मिलने वाले रिवर बेस्ड मटीरियल (आरबीएम) से सवा दो करोड़ रुपये का राजस्व सरकार को मिलेगा। झीलों के पानी से कोटद्वार क्षेत्र को ग्रेविटी आधारित पेयजल योजनाएं बनाकर जलापूर्ति भी कराई जा सकेगी। भविष्य में इन झीलों को पर्यटन से भी जोड़ा जाएगा।जल संरक्षण पर मौजूदा सरकार ने खास फोकस किया है।




वन क्षेत्रों में वर्षाजल रोकने के लिए खाल-चाल (छोटे-बड़े तालाबनुमा गड्ढे), चेकडैम जैसे उपायों के बेहतर परिणाम सामने आए हैं। इस कड़ी में अब वन विभाग के जरिये नदियों में झीलें बनाकर जल संरक्षण की मुहिम शुरू की गई है। पौड़ी गढ़वाल जिले के अंतर्गत कोटद्वार क्षेत्र की खोह नदी में इसे धरातल पर उतारा जा रहा है। वन विभाग ने खोह नदी पर दुर्गा देवी मंदिर और श्री सिद्धबली मंदिर के नजदीक झील निर्माण के लिए लघु सिंचाई विभाग को कार्यदायी संस्था बनाया है। इन झीलों के आकार लेने के बाद अन्य क्षेत्रों में भी तेजी से कदम बढ़ाए जाएंगे।



डॉ. हरक सिंह रावत (वन एवं पर्यावरण मंत्री, उत्तराखंड) का कहना है कि जल संरक्षण की दिशा में राज्य का वन महकमा पहली बार नदियों पर झीलों का निर्माण कराकर ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। कोटद्वार के अलावा देहरादून, नैनीताल, हल्द्वानी समेत अन्य क्षेत्रों की नदियों पर भी झीलों का निर्माण कराया जाएगा। इसके लिए जायका और कैंपा से धन की व्यवस्था की जाएगी।