राज्य सरकार शिक्षकों के वेतन में कटौती कर वेतन वितरण कर रही है। हालांकि भाजपा नेताओं ने कोरोना काल में खुद 58,000 का अनुदान किया है। चौंकिए मत ! यह अनुदान पूरी भाजपा ने मिलकर किया है। दूसरी तरफ सभी सरकारी कर्मचारियों का वेतन काटा जा रहा है। अशासकीय स्कूलों में तीन महीने से वेतन भुगतान नहीं होने से शिक्षक-कर्मचारियों में रोष व्याप्त है। भुगतान के लिए कई दफा आश्वासन मिलने के बाद भी वेतन नहीं मिलने से शिक्षक-कर्मचारी ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। 25 सितंबर तक वेतन भुगतान नहीं होने पर माध्यमिक शिक्षणेत्तर एसोसिएशन ने प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है। एसोसिएशन ने वेतन ना मिलने के मुद्दे पर सोमवार को एक ऑनलाइन बैठक बुलाई। बैठक में प्रदेश अध्यक्ष बीएस पंवार ने कहा कि शिक्षा विभाग और शासन स्तर पर कई दफा अपनी समस्या रखी जा चुकी है बावजूद इसके कोई भी अशासकीय स्कूलों के कर्मचारियों की सुध लेने को तैयार नहीं। एसोसिएशन के प्रदेश महामंत्री संजय कुमार गर्ग ने कहा कि वैसे ही शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को कम वेतन में अपना गुजारा करना होता है। चार महीने होने को आए हैं लेकिन अब तक वेतन जारी नहीं हुआ।



आपको बता दें कि प्रदेश भर में करीब 15,000 से ज्यादा शिक्षक और कर्मचारी वेतन के इंतजार में है। कई कर्मचारियों को होम लोन चुकाने के लिए बैंक से नोटिस आने शुरू हो गए हैं, लेकिन शिक्षा विभाग कर्मचारियों का वेतन जारी करने को राजी नहींम।ऐसे में आंदोलन के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। एसोसिएशन ने 25 सितंबर तक वेतन जारी नहीं होने पर 26 सितंबर से प्रदेश व्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।

नेता जिसको आवास, बिजली, यात्रा, पानी इत्यादि जैसी निःशुल्क सुविधाओं के साथ एक-डेढ़ लाख वेतन मिलता है, वह तो सभी मिलकर मात्र 58,000 का अनुदान करें और आम नागरिक के वेतन से बराबर कटौती की जाए। भाजपा की दोगली नीतियों से जैसे देश परेशान है, उसी प्रकार राज्य भी परेशान है। दरअसल भाजपा के पास देश को विकास ले रास्ते पर चलाने की कोई नीति है ही नही। गिनचुन के दो-चार फैसले लिए गए वह भी कांग्रेस के कार्यकाल की रूपरेखा थी। बिना किसी सोच विचार के लिए फैसलों ने न सिर्फ देश बल्कि राज्य को भी वर्षो पीछे धकेल दिया है। बीजेपी शासित प्रदेशो में विवेकहीन लोगों को मुख्यमंत्री बनाया गया। आज एक तरफ राज्यों के युवा रोजगार के लिए त्रस्त हैं वही दूसरी ओर सरकारी महकमों से लोगों को जबरन निकाला जा रहा है और उसको नाम दिया गया- स्वैच्छिक सेवा निवर्ति । सरकार चाहती है कि पहले सरकारी संस्थानों से लोगों की संख्या कम करो, जिससे आवाज उठाने वाले ही न बचें और अंत में संस्था को ही बेच दो। यही तो हुआ BSNL, Railway, MTNL जैसी संस्थाओं के साथ।