उत्तराखंड राज्य को अलग हुए 20 साल होने को आये लेकिन राज्य की स्थिति हर पांच साल में बीते पांच सालों से खराब होती जा रही है। बात शिक्षा की हो, स्वास्थ्य की हो, संसधानों की हो, रोजगार की हो या फिर पलायन की हो, स्थिति दिन ब दिन खस्ता हाल होती जा रही है। राज्य के युवाओं को पहले तो उचित शिक्षा से ही वंचित रखा जा रहा है। और जैसे कैसे अगर कोई संघर्ष करके शिक्षा हासिल कर भी रहा है तो उसको रोजगार देने के लिए सरकार के पास कोई ठोस नीति नही है। यह खेल राज्य में आज से नही बल्कि अलग राज्य बनने के बाद ही शुरू हो गया था। लेकिन युवा वर्ग इसको समझ नही पाया।



आज जब भाजपा ने पहले से लाचार सरकारी व्यवस्था में निजीकरण शुरू किया तो स्थिति और भी भयवा हो गई है। राज्य अलग करने की मांग के समय स्वर्गीय गोविंद बलभ पंत ने कहा था कि इसको अलग मत करो क्योंकि राज्य में संसाधनों का बहुत बड़ा अभवा है। राज्य का युवा रोजगार के लिए तरस जाएगा और मंहगाई पूर्ण रूप से हावी हो जाएगी। लेकिन उस वक्त किसी को यह ध्यान नही आया। आज उत्तराखंड मंहगाई में टॉप छह राज्यो में सुमार हो गया है। रोजगार के लिए ले देकर सरकारी संस्थान थे जिनको विवेकहीन भाजपा लगातार खत्म करने पर लगी हुई है। पूरे देश में भाजपा की नीतियों का युवा छात्र वर्ग विरोध कर रहा है लेकिन उत्तराखंड का युवा अभी भी सोया हुआ है। 17 सितम्बर 2020 को देश के विभिन्न छात्र संगठनों ने "बेरोजगार दिवस" मनाने की घोषणा की लेकिन उत्तराखंड के छात्र संगठन खामोश रहे।

छात्र संगठनों की इस खमोशी के लिए नाना पाटेकर का एक डायलॉग फिट बैठता है -" बैठे रहो नमर्दो हाथ पे हाथ रख के, तुम्हारी मौत का तमाशा भी दुनिया इसी खामोशी से देखेगी" आज जब देश के छात्र संगठनों को एक जुट होकर बेरोजगारी के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए थी, उस वक्त उत्तराखंड के छात्र संगठन व छात्र मौन हैं। भाजपा देश और राज्यों को मनमाने तरीको से संचालित कर रही है और युवा "मन की बात" सुन रहा है। भाजपा एक एक उन संस्थानों को बेचने में लगा हुआ है जिनमें लाखों लोगों को रोजगार मिलता था और युवा सोया हुआ है। क्योंकि जब सपना ही चाय बेचने वाला बेच रहा है तो उस सपने से नींद खुल भी नही सकती है। यही सपना कोई अर्थशास्त्री या उच्च विश्लेषण शक्ति वाला व्यक्ति बेचता तो आज लाखों पढे लिखे युवाओं के हाथ में मनरेगा की कुदाल और सब्बल न होती। जिस देश में करोड़ो युवा बेरोजगार हो उस देश में एक मशीन हजारों के रोजगार को प्रभावित करती है। क्या युवा को आधुनिकरण के उचित वर्गीकरण पर खुली बहस नही करनी चाहिए थी ? लेकिन नही ! युवाओं को आदत हो गई है दूसरे को खेलता देखकर ताली बजाने की, लेकिन इतना साहस बाकी नही है कि उस खेल को खुद खेल के देख सके।

जिस लोगों को भगवान बना बैठे हो कभी सोचा है उनके बेटे कहां हैं आज ? नही सोचा होगा क्योंकि भांड मीडिया ने इतना भ्रमित कर रखा है कि युवा में सही विश्लेषण की शक्ति बची ही नही है। देश में वंशवाद को खत्म करने के नाम पर सत्ता में आए नेताओं के अयोग्य पुत्र आज करोड़ो के मालिक बन चुके हैं और बेरोजगार युवा लगा हुआ है मोदी है तो मुमकिन है। नितिन गटकरी का बेटा आज देश के नेशनल हाईवे का संचालक है, अजित डोभाल का बेटा देश के रक्षा उपकरणों का फाइनेंस कर्ता और अमित शाह का गया गुजरा बेटा जय शाह बीसीसीआई का अध्यक्ष है। कभी खुद से भी एक सवाल पूछो की तुम्हारे पिता जिस भी सरकारी नौकरी पर थे, क्या तुम आज उनकी बराबरी का वेतन ले पा रहे हो ? वेतन तो छोड़ो, आज युवाओं का वेतन भी पिता की पेंशन के बराबर नही है। ऐसी स्थिति में भी राज्य का युवा खमोश है तो इसका सीधा सा मतलब है कि राज्य के युवा को अपने अधिकारों का बोध ही नही है।