उत्तराखंड में स्नातक धारकों के भविष्य से हो रहा खिलवाड़ , सरकारें नही समझ सकती युवाओं का दर्द ।

 

राज्य में रोजगार के लिए युवाओं की लाइन इतनी लम्बी है कि हर साल कम से कम तीस से चालीस हजार पदों पर भर्ती की जरूरत है। लेकिन राज्य सरकार दस हजार का आँकड़ा भी छूने में असमर्थ है। इन में अधिकांश पद चतुर्थ श्रेणी के व डिप्लोमा धारकों या इंटरमीडिएट तक ही सीमित हैं। राज्य में लाखों की संख्या में बी.ए/ बी.एससी और एम.ए/ एम.एससी युवा बेरोजगारी की मार झेल रहा है जिसके लिए रोजगार का कोई साधन नही है। यही स्थिति राज्य में बी.टेक किए हुए युवाओं की भी है।


सरकार आज अधिकांश पद प्रमोशन से भर रही है या जहाँ विज्ञप्ति देती भी है वहाँ 8 से 10 वर्ष का अनुभव (experience) मांग रही है। ऐसे में स्नातक युवा कैसे आगे बढ़ पाएगा। स्थिति यह है कि स्नातक युवा चतुर्थ श्रेणी के पदों पर आवेदन करने को मजबूर है। कहीं कहीं तो उच्च शिक्षा होने के बाद भी छोटे पदों पर आवेदन ही नही हो सकता है। जी हाँ, राज्य में जेई के पदों पर इंजीनियरिंग स्नातक आवेदन ही नही कर सकता है, और जो एई के पद हैं उन पर जेई प्रमोशन ले रहे हैं। ऐसे में इंजीनियरिंग स्नातक के लिए उसी के क्षेत्र में कोई नौकरी नही है। लाखों की संख्या में युवा इंजीनियरिंग करके बैठे हैं, लेकिन वर्षो गुजरजाने के बाद भी कोई पद उनकी शिक्षा से सम्बंधित नही निकलता है। थक हार कर अब इंजीनियरिंग किए हुए युवा भी दूसरे पाठ्यक्रमों की पढ़ाई कर रहे हैं।


सरकार से सवाल ये है कि जब स्नातक वर्ग के लिए रोजगार है ही नही, तो नई शिक्षा नीति में स्नातक को रखने की जरूरत ही क्या है? रोजगार के नाम पर ऐसा भद्दा मजाक युवाओं को साथ मत कीजिए । लाखों की संख्या में बेरोजगार बैठे युवा के वर्षो बाद 800 पद ऊंठ के मुँह में जीरे के समान हैं। युवा 30-30 वर्ष या उससे अधिक आयु तक केवल इसलिए संघर्ष कर रहे हैं कि शायद कोई वेकैंसी आएगी । कोई भी युवा आपसे मुफ्त रोजगार नही मांग रहा है। वह केवल मौका मांग रहा है कि मुझे वर्ष में कम से कम 2-3 मौके तो दे दो । लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद एक परीक्षा में बैठना और उसका परिणाम के लिए पुनः एक-दो वर्ष की प्रतीक्षा करना, बहुत दुःख देता है।


इंजीनियरिंग जैसी डिग्रियों पर लाखों खर्च करने वाले युवाओं को क्या मिला? इससे तो अच्छा था चार युवा मिलकर कोई अपना काम शुरू कर लेते उसी पैसे से। कम से कम अनिश्चितता से तो बच जाते। यहां तो ये भी नही मालूम की वर्षो पढ़ने के बाद उसी पढ़ाई से सम्बंधित नौकरी मिलेगी भी या नही । पहले युवाओं को थोड़ा बहुत केंद्रीय नौकरियों की आश होती थी लेकिन अब वहां भी दो-दो वर्ष बीत जाने तक परीक्षाएं ही सम्भव नही हो पा रही हैं तो युवाओं की आश अब टूटने लगी है। रहे बचे सरकारी महकमों को केंद्र सरकार बेच खा गई तो अब वहाँ भी पदों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। अब अगर सरकार चाहती है कि बिना नौकरी के ही युवाओं को रखना है तो नई शिक्षा नीति में स्नातक शब्द नही रखना चाहिए था। सर्वाधिक शिक्षा 12वीं पास ही होनी चाहिए थे। वैसे भी देश को चलाने वाले नेताओं में अधिकांश के पास तो नियमित 12वीं भी नही होगी। हाँ, कहीं से बी.ए/ एम.ए डिग्री खरीद ली हो तो इसका कुछ कहा नही जा सकता है। दूसरी वजह यह भी है कि स्नातक शिक्षा तो वैसे भी खाना पूर्ति ही है। नाम के टेक्निकल कॉलेज सिर्फ थ्योरी रटा रहे है उसके बाद भी बच्चे पास नही हो पा रहे हैं। दूर मत जाइये, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के पॉलीटेक्निक कॉलेज ही ले लीजिए। जहां शिक्षा के नाम पर एक या दो ही शिक्षा है और परीक्षाएं भी बाबू ही करवा रहा है। मतलब टेक्निकल कॉलेज और बेसिक स्कूल में सरकार को अंतर नजर नही आ रहा है। फिर छोड़िए न सब, शिक्षा को बस 12वीं तक ही कर दीजिए। कम से कम लोगों के पास जो थोड़ा बहुत आजीविका के लिए पैसा है वो बचा तो रहेगा।

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