कुछ यादें ऐसी होती हैं जिनका अपना एक अलग ही इतिहास भी होता है । टॉकीज छाया सिनेमा हॉल ऋषिकेश उन्हीं यादों का एक इतिहास रहा है जो वर्ष 2020 में पूरी तरह से दम तोड़ गया। 1958 में शुरू हुआ ये सिनेमा हॉल पहले 1992 बंद हुआ। 37 साल तक इस सिनेमा हॉल ने तीर्थनगरी ही नहीं बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और यहां तक की पहाड़ से आने वाले लोगों का भी भरपूर मनोरंजन किया।



1958 में रेलवे रोड पर स्थित छाया सिनेमा हॉल की स्थापना लाला रतन चंद गुप्ता ने की थी। 37 साल तक इस सिनेमा हॉल ने कई उतार-चढ़ाव देखे। तब ये शहर का अकेला सिनेमा हॉल था। इसके बाद देहरादून या हरिद्वार में ही सिनेमा हॉल थे। छाया पिक्चर हॉल में तीर्थनगरी ही नहीं पहाड़ों से भी लोग सिर्फ पिक्चर देखने ऋषिकेश पहुंचते थे। 55 एमएम के पर्दे वाले इस सिनेमा हॉल में बालकनी नहीं थी। लेकिन लाला रतन चंद गुप्ता ने हॉल को कुछ इस तरह से डिजाइन करवाया था कि हॉल के भीतर एसी में बैठने का अहसास होता था। तीर्थनगरी में 1975 तक छाया पिक्चर हॉल का एकछत्र राज रहा। इसके बाद देहरादून रोड पर शोभा पिक्चर हॉल खुल गया। जिसका नाम बाद में रामा पैलेस कर दिया गया। इसके अलावा कुछ वर्षों बाद यहां तीसरा सिनेमाघर भी वजूद में आया, जिसका नाम ऋषि टॉकिज था। जो कुछ सालों में बंद हो गया। छाया टॉकिज ने पूरे 37 वर्षों तक लोगों का भरपूर मंनोरंज किया। इसके बाद यह 1992 में बंद हो गया।




पिक्चर हॉल में लगी पहली पिक्चर गोपाल भैया उस समय दर्शकों को फ्री में दिखाई गई थी। तब यहां के बहुत से लोगों ने पहली बार सिनेमा हॉल में पिक्चर देखी थी। 90 के दशक में आई फिल्में प्यार झुकता नहीं, नमक हराम, वीराना, जल्लाद, कालिया जैसी फिल्मों को देखने के लिए लोग सिनेमा हॉल में दूर-दूर से उमंड़ पड़ते थे। तब 3 से 6, 6 से 9 और 9 से 12 का आखिरी शो चलता था। टिकट मात्र 25 पैसे से सवा रुपये तक होता था। स्पेशल शो का टिकट 3 रुपये का होता था।



वर्ष 1992 के दौर में नए नए सिनेमा घरों के खुल जाने से टॉकीज छाया सिनेमा ऋषिकेश के अस्तित्व पर संकट घराने लगा और इसे बन्द करना पड़ा। उस वक्त से लेकर आज तक टॉकीज छाया सिनेमा ऋषिकेश की इमारत वैसी की वैसी खड़ी थी जिसको देखकर लोग पुरानी यादें ताजा किया करते हैं। लेकिन अब इसके ध्वस्तीकरण का कार्य चल रहा है और अब टॉकीज छाया सिनेमा के नाम से कोई इमारत नही दिखेगी ।