उत्तराखंड राज्य में कोरोना वायरस संक्रमण समायावधि में घर लौटे युवाओं के लिए मुख्यमंत्री स्वरोजगार के तहत युवाओं को अनेक सपने दिखाए गए । घर लौटे युवाओं को सहारे की किरण भी नजर आने लगी थी। लेकिन इससे पहले की योजनाएं धरातल पर उतर पाती, बैंकों ने हाथ खड़े कर दिए। देखा जाये तो बैंकों की जिम्मेदारी सरकार की है कि, बैंकों में पैसों का उचित प्रबन्ध बनाये रखे । अब युवा बैंकों की राह देख रहे हैं कि आवेदन की गई योजना के लिए बैंक से कब फोन आएगा की आपका लोन पास हो गया है। अधिकांश युवा तो उम्मीद छोड़ चुके हैं और वापस दूसरे राज्यों के लिए रुख करने लगे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत 25Kw का सोलर प्लांट फिर से रोजगार देने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।


इस योजना के तहत पहले केवल 1000 लोगों को लाभार्थित किया जाना था, लेकिन अब इसको बढाकर 3000 कर दिया गया है। इस प्लांट के लिए बहुत सारी शर्तें भी हैं जिनको पूरा करने वाला आवेदक ही इस योजना का पात्र माना जाएगा। राज्य में बेरोजगारों की संख्या को देखते हुए यह योजना नाकाफी साबित होती नजर आ रही है। दूसरा प्रोजेक्ट के लिए मिलने वाला ऋण बैंक पास करेगा इसकी भी कोई प्रतिबद्धता नही है। हालांकि इस योजना में लोन मिलने की प्रायिकता अधिक है क्योंकि सोलर प्लांट से उत्पादित बिजली सरकार खरीद रही है। दूसरा लोन आवेदकों की संख्या भी कम है। लेकिन अगर सम्पूर्ण प्रोजक्ट का बारीकी से अध्ययन करें तो ग्रीष्मकालीन समय में लाभार्थित व्यक्ति बैंक की क़िस्त के बाद महज तीन से चार हजार ही बचा सकेगा और शीतकाल में यह बचत और भी कम हो जायेगी। अगर पर्वतीय क्षेत्र में किसी प्रकार के भूस्खलन या अन्य आपदा में प्लांट को छती हुई तो बैंक लोन के व्यय के लिए सरकार किस प्रकार की आर्थिक मदद करेगी, ये भी साफ नही है।



इस योजना का लाभ मध्यम अमीर और अमीर व्यक्ति तो उठा सकते हैं, लेकिन इस योजना को स्वरोजगार की दृष्टि से देखना उतना उचित नही लगता है। क्योंकि प्रोजेक्ट की कीमत को देखते हुए गरीब व्यक्ति इस योजना में हाथ नही डाल सकता है। और अगर राज्य में लौटे नागरिकों में अधिकांश लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नही की वह महज 3 से 4000 के लिए माह भर सोलर प्लांट के रखरखाव में ही बैठें रहें। प्रोजेक्ट के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए समस्त विवरण नीचे पढ़ें-