अल्मोड़ा जिले के रानीखेत तहसील व ताड़ीखेत ब्लॉक के सुदूर रूमा गांव की। यहां 60 के दशक में आई पलायन रूपी आपदा ने इसे फिर आबाद न होने दिया। किसी दौर में यहां 50 परिवार (ब्राह्मण सती) व 12 शिल्पकारों का कुनबा रहता था। लगभग 20 मीटर लंबा ही आंगन। जो कुमाऊं की पटाल संस्कृति के जिंदा होने का सबूत दे रही। लंबे चौड़े आंगन के बीच खोली (बुजुर्गों के बैठने का विशिष्ट स्थान)। ज्यादातर दोमंजिले मकान। करीने से तैयार किए गए सीढ़ीदार खेत। सब कुछ किसी दौर में खुशहाल व समृद्ध कृषि प्रधान गांव की गवाही भी दे रहे। आज पूर्ण रूप से खण्डरह हो चुकी इस बिरान जगह का भी अपना एक अलग ही इतिहास है।


यहां के लोग रोजगार व बच्चों की पढ़ाई के लिए बाहर निकले और वहीं के होकर रह गए। 1997-98 में शेष दो परिवार भी गांव छोड़ गए। अबकी वैश्विक महासंकट में जहां जिले में 50 हजार प्रवासी वापस अपने गांव लौटे, मगर रूमा गांव का रुख किसी ने नहीं किया। पलायन रोकने को गठित आयोग ने पर्वतीय जिलों के 7950 ग्राम पंचायतों के 16500 गांव व तोकों का सर्वे कर बीते मई में जो रिपोर्ट दी, उसके मुताबिक एक दशक में 3946 ग्राम पंचायतों से 118981 ग्रामीणों ने अपने अपने गांव छोड़ दिए। 2.80 लाख घरों पर ताले पड़ चुके हैं। पौड़ी जिले में राज्य गठन के बाद सर्वाधिक 370 व अल्मोड़ा में 256 गांव पलायन से वीरान हो चले हैं। पूर्व सीएम हरीश रावत ने 1100 गांवों को भुतहा घोषित कर रिमाइग्रेशन की योजना को कैबिनेट में मंजूरी दिलाई पर अमल न हो सका।