न सड़क, न स्वास्थ्य और न शिक्षा 


उत्तराखंड के राजकालीन शासन का सन 1949 में भारत सरकार के अधीन विलय हो गया था । उसके बाद उत्तराखंड उत्तर प्रदेश के अधीन रहा और जब तक उत्तराखंड अलग नही हुआ उस वक्त तक यही कहा जाता था कि लखनऊ से दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों का उचित संचालन करना सम्भव नही है। उत्तरांचल की मांग में प्रमुख मुद्दा भी यही रहा और 9 नवम्बर 2000 को उत्तरांचल एक अलग राज्य के रूप में उभर ले आया । आज लगभग 20 वर्ष हो चुके हैं लेकिन सवाल वही है कि पहाड़ों पर शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़कों का आज भी जो भारी आभाव है उसका कसूरवार कौन है ? इससे भी बड़ी विड़म्बना यह है कि राजधानी के समकक्ष क्षेत्र भी आज तक इन समस्याओं से नही उभर पाए हैं ।



देहरादून जनपद की सीमा पर उत्तरकाशी जनपद के पुरोला ब्लॉक के कामरा, सांखाल और मटियालौड़ गांव पड़ते हैं। इन गांवों में सभी परिवार अनुसूचित जाति के हैं। यातायात की बात करें तो यह ग्रामीण पुरोला से 46 किमी दूर गढ़सार तक वाहन से आवागमन करते हैं। उसके बाद ग्रामीण यहां से करीब 12 से 15 किमी पगडंड़ियों के सहारे अपने गांव पहुंचते हैं। यहां से यातायात की सुविधा नहीं होने से ग्रामीण घोड़े, खच्चरों से अपने घरों तक सामान पहुंचाते हैं। शिक्षा की बात करें तो आठवीं तक के शिक्षा के बाद यहां के ग्रामीण अपने बच्चों को पुरोला में किराए के मकानों में रहकर पढ़ाने को मजबूर हैं। स्वास्थ्य की बात करें तो इन गांवों के ग्रामीण आपातकाल में डंड़ी-कंड़ी की मदद से मरीजों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पुरोला या फिर बर्नीगाड़ पहुंचाते हैं। पेयजल की स्थिति भी बेहद ही बदहाल है। इन गांवों के ग्रामीण आज भी प्राकृतिक स्रोतों से पानी ढोने को मजबूर हैं। जलसंस्थान ने दो दशक पहले इन गांव में पेयजल लाइन बिछाई थी, लेकिन, देखरेख और विभाग की लापरवाही के कारण विभाग की यह योजना भी धरातल पर दम तोड़ गई।




आजादी के 70 साल बाद भी राज्य के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र की स्थिति ऐसी है कि वहां रहने का मतलब है 24 घण्टे खतरें में रहना । वर्तमान में कामरा गांव में 30 परिवार, सांखाल में 35 और मटियालोड़ में 07 परिवार निवास करते हैं। इन तीनों गांवों की आबादी 480 के करीब है। आश्चर्य की बात यह है कि सरकार अनुसूचित जाति के परिवारों के लिए विकास के बड़े-बड़े दावे करती हैं, लेकिन आज भी गांव में यदि कोई बीमार होता है तो सड़क न होने के कारण उसे ग्रामीण अपनी पीठ पर या चारपाई पर ढ़ोने को मजबूर हैं। गांव के पास कोई भी अस्पताल नहीं है। यही नहीं पोस्ट आफिस के लिए भी ग्रामीणों को 14 किलोमीटर की पैदल दूरी तय कर भंकोली जाना पड़ता है।




पहाड़ी क्षेत्र को बर्बाद करने में जो भूमिका उत्तराखंड के नेताओं ने निभाई उसका ही नतीजा है कि अंग्रेजी शासन काल में बसे शहर भी सुदृढ नही हो सके । आप चाहे मुख्य टिहरी शहर को देख लीजिए, चाहे श्रीनगर गढ़वाल को देख लीजिए। राजधानी से कुछ ही घण्टों की दूरी पर बसे इन दो शहरों के लिए न तो आज तक उचित सड़क का प्रबन्ध हो सका और न ही स्वस्थ्य सेवाओं का । श्रीकोट में चल रहा मेडिकल कॉलेज भी महज खानापूर्ति है। न तो वहां सभी विभागों के डॉक्टर हैं और नही सभी रोगों के लिए प्रयोगशालाएं हैं। आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के लोग यहीं इलाज के लिए आते हैं लेकिन उचित व्यवस्था न होने के कारण उनको ऋषिकेश या देहरादून ही आना पड़ता है। जबकि दूसरी तरफ नेताओं की बात करें तो नेताओं ने उत्तराखंड से बाहर भी अरबों खरबों की प्रोपर्टी जोड़ रखी है। सबसे मजेदार बात यह है कि नेता जिस क्षेत्र के मूलभूत निवासी थे उन्होंने उस क्षेत्र के विकास पर भी कभी ध्यान नही दिया। आज स्थिति यह है कि प्रसव पीड़ा में भी माताएं बहने कई किलोमीटर पगडण्डी के सहारे चलकर सड़क तक पहुंचती है और इस बीच कई बार कुछ माता-बहने दम भी तोड़ देती है।