रोडवेज के डिपो में इंडियन आयल से तेल सप्लाई होता है। रूट पर जाने से पहले बसें यहां से डीजल भरती हैं। बाहरी डिपो की बस में भी तेल भरा जा सकता है। बशर्ते इसका पूरा रिकार्ड रखना पड़ता है। ताकि बाद में दिक्कत ना आए। हर साल अलग-अलग डिपो के एआरएम को तेल खर्च का पूरा ब्योरा देना पड़ता है। जिसके बाद इंडियन आयल को भुगतान होता है। उत्तराखंड परिवहन निगम में 26 लाख से अधिक का डीजल गायब हो गया। यह आंकड़ा वित्तीय वर्ष 2019-20 का है। डिपोवार तेल की समीक्षा में यह घपला सामने आया है। पता चला कि कुमाऊं के सात डिपो में छूट के बावजूद 37317 लीटर तेल का हिसाब नहीं मिल रहा। इसे शार्ट कैटेगरी में डाल दिया गया। जिसके बाद संबंधित डिपो के सहायक महाप्रबंधकों को रिकवरी के बाबत नोटिस भी भेजा गया, मगर अब मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।


मार्च 2020 के रिकार्ड के मुताबिक नैनीताल रीजन के तहत आने वाले सात डिपो अल्मोड़ा, रानीखेत, भवाली, काठगोदाम, हल्द्वानी, काशीपुर, रामनगर में सालभर टैंकरों से भेजे तेल और परिवहन निगम के आंकड़ों में 37317 लीटर का फर्क आ रहा है। यानी आयल कंपनी द्वारा यह डीजल तो भेजा गया था, मगर गया कहां, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं। वर्तमान बाजार दर के हिसाब से गायब डीजल की कीमत 26 लाख 12 हजार 190 रुपये है। इंडियन आयल द्वारा कुछ डिस्काउंट भी दिया जाता है। ऐसे चला पता सभी डिपो ने सालाना तेल खर्च की रिपोर्ट बनाने के बाद वित्त विभाग को सौंपी। जिसका भौतिक सत्यापन करने के साथ कागजी आंकड़ों का मिलान भी किया गया। जिसके बाद परिवहन निगम मुख्यालय और इंडियन आयल कंपनी ने मानकों के अनुसार शार्टेज का समायोजन भी किया। उसके बाद भी 37317 लीटर तेल का अंतर कम नहीं हुआ। सबसे ज्यादा काठगोदाम डिपो में तेल शार्ट हुआ है।