09 नवम्बर को राज्य गठन के 20 वर्ष पूरे होने जा रहें, क्या है राज्य में रोजगार की स्थित ? पढ़े खबर....



उत्तराखंड राज्य के लिए जिन लोगों ने संघर्ष किया, जिन लोगों ने प्राण दिए, आज देखते होंगे कि क्या इस उत्तराखंड के लिए लड़े थे हम तो रोते होंगे । सियासतदान भूल गये कि कितने लोगों के सर से पिता का हाथ उठ गया था, कितनी माताओं ने अपने लाल खोए, कितनी स्त्रीयों का अपमान हुआ । लेकिन बदले में क्या मिला ? न सही शिक्षा, न स्वास्थ्य और न रोजगार । लंबे जनसंघर्ष और 42 कुर्बानियों के बाद मिले अलग राज्य में विकास कार्य तो हुए लेकिन पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल ज्वलंत बने हुए हैं। प्रदेश में बेरोजगारी दर में तीन गुना से अधिक का इजाफा हुआ है।


किसी मशहूर शायर की लिखी एक पंक्ति याद आती है -कि " मैं अपनी बर्बादी लिखूंगा और लोग वाह वाह करेंगे" यही हाल आज उत्तराखंड का है। पर्यटक आके गंगा और धर्मिक स्थलों पर शराब पीकर निकल जाते हैं और सरकार पर्यटन से आये पैसे को देखकर वाह वाही लूट रही होती है । उत्तराखंड अलग राज्य आंदोलन की मांग में बढ़चढ़ के भाग लेने वाले पहाड़ी लोगों को आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा गया है।


पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 3946 गांवों में से एक लाख 18 हजार 981 लोग स्थाई और 6338 गांवों में से 3,83,726 लोग अस्थाई रुप से रोजगार, शिक्षा के लिए पलायन कर चुके हैं। राज्य आंदोलन में गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की प्रमुख मांग को दरकिनार करते हुए ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई जा चुकी है। जघन्य रामपुर तिराहा, मुजफ्फरनगर और खटीमा कांड के दोषियों को सजा नहीं मिल सकी है। राज्य आंदोलन के गर्भ से निकले सवालों के जस के तस होने से आंदोलनकारी निराश हैं।


उत्तराखंड अलग राज्य की माँग का मुख्य कारण रहे पहाड़ी क्षेत्र ही सबसे ज्यादा पिछड़ गये । पहाडी नागरिक को क्या मिला ? स्कूलों के हाल उत्तरप्रदेश शासन काल से बदतर स्थिति में चले गये । राज्य गठन के 20 वर्ष बाद भी रोजगार के लिए उद्योग स्थापित नही हो सके । पहाड़ों की उत्तर प्रदेश की राजधानी से दूरी रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क के सवाल थे। वर्ष 1994 में आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया था और इसके फलस्वरूप आंदोलनकारियों को दमन और प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी। खटीमा, मसूरी, रामपुर तिराहा, श्रीनगर सहित अन्य गोलीकांडों में 42 लोगों ने जान गंवाई थी।


दिल्ली प्रदर्शन को जा रहे महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं हुई थी। तमाम दमन और संघर्षों के बाद एक नवंबर 2000 को देश के 27वें राज्य के रूप में उत्तरांचल का गठन हुआ था और वर्ष 2007 में इसका नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया था। राज्य गठन के 20 साल होने जा रहे हैं। इन सालों में प्रदेश में तरक्की के नए आयाम स्थापित हुए हैं। सड़क, बिजली, शिक्षा, उद्योग, स्वास्थ्य सहित तकरीबन सभी क्षेत्रों में सरकारों ने काम किए हैं।


आखिर सत्ता में बैठे लोग भूल कैसे गये ? कि जिस राज्य में बैठकर करोड़ो की योजना डकारी जा रही है उसी राज्य का एक नागरिक बिना उचित शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क,बिजली और रोजगार के शहर से मिलों दूर पहाड़ पर आज भी जी रहा है। राज्य मांग से लेकर आज तक गैरसैंण गैर क्यों बना हुआ है ? उसको अपनाने से इतना गुरहेज किस लिए ? पहाड़ी क्षेत्र के युवा को कमजोर करने पर क्यों है सरकारों का विशेष ध्यान ? खानापूर्ति से क्या दिखाना चाहते है सत्ता में बैठे लोग ? मत भूलों तुम भी उन्ही पहाड़ो से निकल कर देहरादून में आये हो जहाँ कभी बिजली, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं नही थी । हाँ, लेकिन शिक्षा उस वक्त आज से अच्छी स्थिति में थी । रोना तो इस बात का है कि जिस उत्तर प्रदेश से यह कहकर अलग हुए थे कि उत्तर प्रदेश से दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र तक सुविधाएं नही पहुंचाई जा सकती है, वही दुर्गम क्षेत्र आज उससे भी बुरी स्थिति में चले गये हैं। न शिक्षा पहुंची ,न स्वास्थ्य पहुंचा ,न बिजली पहुंची और न सड़क तो इंसान वहां रहकर क्या करता ? वो भी चला आया सत्ताधारियों का शहर देखने ।

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