उत्तराखंड के पहाड़ी दुर्गम क्षेत्रों में मातृत्व का एहसास दुःख और पीड़ा का वह सबब है जिसको पहाड़ी महिलाएं मिलों पगडण्डियों के सहारे चलकर प्राप्त करती है। इस बीच अगर ऐसी मातृ शक्ति के साथ कोई अनहोनी होती है तो उसकी जवाबदेही न सरकार समझती है और न स्थानीय शासन व प्रशासन ।


महिलाओं के गर्भवती होने पर नए मेहमान के स्वागत नहीं, बल्कि सुरक्षित प्रसव कैसे हो, इसकी तैयारी की जाती है। क्योंकि, यहां एंबुलेंस नहीं आती। आए भी कैसे, उसके लिए सड़क जो जरूरी है। अस्पताल भी आसपास नहीं मिलते। बात चंद रोज पहले की है। उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र के एक सीमावर्ती गांव में महिला को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। सड़क छह किलोमीटर की दूरी पर थी और अस्पताल कई मील। ग्रामीण किसी तरह महिला को डंडी कंडी में सड़क तक लेकर आए और फिर एंबुलेंस से अस्पताल। मगर, इस सबमें इतना समय लग गया कि जिंदगी जंग हार गई। राज्य के 21वें स्थापना दिवस पर एक सौगात सेहत की घुट्टी के रूप में भी मिल जाती तो अत्यंत सुखद होता।


बीते 20 वर्ष में उत्तराखंड तमाम बदलाव देख चुका है। सरकारें पंचवर्षीय योजनाओं की तरह बदली हैं तो कई निजाम उससे भी पहले निपट लिए। पहाड़ की आबोहवा भी बदल गई है और सूरत के साथ सीरत भी। हां, अगर कुछ नहीं बदला तो वो है दुर्गम के दुर्गम होने का अहसास। उदाहरण के लिए गौलापार (हल्द्वानी) के दो गांवों विजयपुर पहाड़पानी और लछमपुर नकायल को ही ले लीजिए।


आजादी के 70 साल बाद भी ये गांव एक आद सड़क के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के दर पर एडिय़ां घिसने के बाद भी किसी के कान में जूं नहीं रेंगी तो मजबूर ग्रामीणों को हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। अब हाई कोर्ट में सरकार ने दो साल के भीतर सड़क के साथ पुल बनवाने का वायदा किया है। उम्मीद है, यह वायदा समय पर पूरा हो जाएगा। बेहतर होगा कि ऐसी स्थिति फिर न आए।