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आलवेदर रोड पर खामोशी क्यों ? क्या दिखाए गये सपने नही पूरे करेगी सरकार ! जाने पूरा सच्च ।

All weather road project uttarakhand

उत्तराखंड राज्य के बद्रीनाथ-केदारनाथ व गंगोत्री-यमनोत्री नेशनल हाइवे को लेकर वर्ष 2016 में जो सपने बेचे गये आज सत्ता के गलियारों में उन पर कोई चर्चा नही है। वर्ष 2016 में शुरू हुए 12 हजार करोड़ रुपये की यह योजना वर्ष 2020 से पूर्व ही दम तोड़ती नजर आ रही है । इस योजना में कुल 900 किलोमीटर और टू लेन सड़क की बात कि गई थी लेकिन धरातल पर कुछ जगह को छोड़कर सड़क की स्थिति यह है कि दो वाहन आमने सामने आ जाए तो जाम की स्थिति पैदा हो जाती है ।


केंद्र सरकार ने जो सपना बेचा

इस योजना के तहत ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग 148 किलोमीटर सड़क(NH-58) निर्माण लगभग 2166 करोड़ लागत से कार्य किया गया । रुद्रप्रयाग से माणा व बद्रीनाथ 160 किलोमीटर सड़क (NH-58) निर्माण लागत 1542 करोड़ रूपये, रुद्रप्रयाग से गौरीकुंड व केदारनाथ 76 किलोमीटर सड़क (NH-109) के निर्माण की लागत 1106 करोड़ रुपये । ऋषिकेश से धरासू 144 किलोमीटर सड़क (NH-94) के निर्माण की लागत 1627.5 करोड़ रुपये, धरासू से यमनोत्री 95 किलोमीटर सड़क (NH-94) के निर्माण की लागत 1920 करोड़ रुपये, धरासू से गंगोत्री 124 किलोमीटर सड़क (NH-108) के निर्माण की लागत 2079 करोड़ रुपये, टनकपुर से पिथौरागढ़ 148 किलोमीटर सड़क (NH-125) के निर्माण की लागत 1557 करोड़ रुपये की लागत केंद्र सरकार ने खर्च की ऐसा सरकार ने वीडियोग्राफी के माध्यम से प्रचार किया था । इन सड़कों का निर्माण सड़क एवं परिवहन मंत्री श्री नितिन गटकरी द्वारा सम्पन्न करवाया गया जिसके मुख्य कार्यकर्ता उन्ही के बेटे थे ।

132 पुलों की श्रृंखला, जिसमे 25 हाई फ्लड लेवल पुल और 107 छोटे पुल शामिल थे । इस प्रोजेक्ट में कुल 13 बाईपास रखे गये थे । 3889 कलवर्ट ( पानी के लिए अंडरपास) जिससे पानी सड़को पर न आए । पागलनाल और लांबागढ़ जैसी 38 लैंडस्लाइड इलाकों पर स्टील जाली के साथ पक्की दीवारें देने का प्रावधान रखा गया था । इस योजना में दो प्रमुख सुरंगे (tunnel) जिसमे सोनगंगा नदी के ऊपर से 25 मीटर ऊँची सड़क को जोड़ा जाएगा और इससे लगभग 25 किलोमीटर का फेर बचाने का प्रावधान रखा गया था । इस सड़क परियोजना का मुख्य उद्देश्य था कि चारधाम यात्रा किसी भी मौसम में की जा सकेगी । इस प्रोजेक्ट में 145 बस बेस भी विकसित किये जाने का प्रावधान रखा गया था । वर्ष 2020 तक इस प्रोजेक्ट को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था । भूमि अधिग्रहण और प्रभावित लोगों को पुर्नवास भी इस प्रोजेक्ट का प्रमुख हिस्सा था ।


आलवेदर सड़क परियोजना कहाँ तक पहुंची ?


वर्ष 2016 में बड़ी धूमधाम से शुरू हुई आलवेदर रोड प्रोजेक्ट योजना कब चारधाम सड़क परियोजना में बदल गई इसका किसी को पता नही चला और अचानक सड़क के किनारे वर्ष 2017 के अंत से चार धाम सड़क परियोजना के बोर्ड नजर आने लगे । इस प्रोजेक्ट का सबसे मुख्य हिस्सा जो माना जा रहा था वह ऋषिकेश से देवप्रयाग, देवप्रयाग से श्रीनगर, श्रीनगर से रुद्रप्रयाग और रुद्रप्रयाग से बद्रीनाथ और केदारनाथ की सड़क (NH-58) को माना जा रहा था । क्योंकि यात्रा के दौरान यही सबसे अहम मार्गों में से एक माना जाता है लेकिन अन्य मार्गों की अपेक्षा यह मार्ग सबसे अधिक खतरनाक भी है । चार साल बीत जाने के बाद और करोड़ो रुपये के वृक्ष कटान व बेचने और दर्जनों लोगों की निर्माण कार्य के चलते मौत के बाद आज इस प्रोजेक्ट की क्या स्थिति है इस पर प्रकाश डालते हैं ।


जब यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ तो सबसे पहले उन जगाहों पर कार्य शुरू किया गया जो पूर्व से पाँच मीटर चौड़ी थी या कार्य करने करने में सुगम थी । पहले वर्षके ही इन जगाहों की पेंटिंग इस प्रकार से की गई कि लोगों को लगा कार्य वास्तव में बहुत तेजी के साथ हो रहा है । खैर उसमें में कार्य करने वालों की किस्मत अच्छी थी कि इस साल वर्षा नही हुई वरना आधे लोगों की तो वैसे ही पोल खुल जाती । इस दौरान लोगों को आने जाने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा, श्रीनगर से देहरादून की दूरी 01 से 02 घण्टे बढ़ गई क्योंकि बीच में कई जगह रुकना पड़ता था । वर्ष 2019 में लीपापोती के बाद प्रमुख जगाहों पर कार्य शुरू किया गया तो ट्रैफिक को बन्द कर दिया गया । लगभग 10 माह बीत जाने के बाद जब मार्ग को खोला गया तो स्थिति ऐसी है कि सड़क पर वाहन चलाने में डर लगता है। कब कहाँ से पत्थर आपके ऊपर आ गिरे कोई पता नही । सामने से अगर बड़ी गाड़ी आ गई तो पासिंग हो सकेगी की नहीं इसके लिए भी सोचना पड़ता है ।

इस प्रोजेक्ट की अवधि 2020 रखी गई थी इसलिए प्रधानमंत्री जी ने भी आव देखा न ताव और दो माह पहले ही सड़क का उद्घाटन कर दिया । उद्धघाटन भी ऐसा हुआ कि सरकार का खुद का वाहन उत्तराखंड रोडवेज उस सड़क पर चलने से डर रहा है । लगभग 10 माह होने को आये ऋषिकेश श्रीनगर मार्ग पर परिवहन बस का संचालन ठप पड़ा हुआ है। मजेदार बात तो यह है कि अभी बहुत से जगहों को छेड़ा ही नही गया है । अगर ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग सड़क की बात करें तो इस पर 40% कार्य ही हुआ है वह भी अभी तक बारिश नही हुई है । क्योंकि जहां सड़क पर खड़ी कटाई हुई है उसका नीचे आना 100% तय है ।


नुकसान का आंकलन भूल गई सरकार

इस योजना के चलते कई निर्दोष लोगों की जाने गई हैं। चाहे वो टिहरी में घर का पुस्ते से दबना हो या चमोली में ऊपर से आये मलवे के नीचे गाड़ी का दबना हो या तीनधार में यात्रियों के ऊपर पत्थर गिरना हो । जिम्मेदार कौन ? ग्रामीण क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य के लिए बनाये गड्ढों में बच्चों को डूबने से मौत का जिम्मेदार कौन ? करोड़ों के वृक्ष काटकर पर्यावरण को हुए नुकसान का जिम्मेदार कौन ?







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