उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र किन किन समस्याओं से जूझ रहे हैं ये शहर में बैठा नेता क्या जाने ? कितने अफसोस की बात है कि राज्य निर्माण के 20 वर्ष बाद भी राज्य में कई गांव ऐसे हैं जहां पानी ही नही पहुंचा सकी सरकार, महज पानी के अभवा में किसी ग्रामीण क्षेत्र में गर्मियों के वक्त शादियां नही होती तो स्थानीय विधायकों समेत राज्य के तमाम मुख्यमंत्रियों को शर्म आनी चाहिए कि एक छोटे से प्रदेश के जो सर्वाधिक भोले लोग हैं उनके साथ छल किया गया है ।

जी हां बात हो रही है नैनीताल जिले के बेतालघाट ब्लॉक के घंघरेठी गांव के तोक चौड़ा की जहां पेयजल संकट सिर चढ़कर बोलता है। पानी की समस्या ऐसी की रोजाना करीब दो किलोमीटर दूर प्राकृतिक जल स्रोत से महिलाएं, बच्चे,बड़े, बूढ़े सिर पर पानी ढोकर खड़ी चढ़ाई पार कर गांव पहुंचते हैं। एक दिन ही नहीं बल्कि रोजाना पानी ढोना नियति बन चुका है। गांव में ग्राम समूह की योजना तो है पर गांव के समीप स्थित प्राकृतिक जलस्रोत सूख जाने से पेयजल बड़ी समस्या बन चुका है। आज ग्रामीण अगर अपने बच्चों की शादी के बारे में भी सोचते हैं तो पहले पानी की व्यवस्था कैसे की जाय इसपे चर्चा होती है और इसी वजह से गर्मियों के दिन शादी के अनुकूल नही समझे जाते हैं।


आपकी जानकारी के लिए स्पष्ट कर दें कि उत्तराखंड में यह संकट केवल कुमाऊँ क्षेत्र का ही नही है बल्कि गढ़वाल क्षेत्र में कई गांव आज भी पैदल चलकर उतराई-चढ़ाई का सामना करके पानी ढोने को मजबूर हैं। हद तो यह जानकर होती है कि जिस राज्य की नदियों को बर्वाद करने के लिए 20 से अधिक बांध (डैम) राज्य में बनाये गए उनसे राज्य की जनता को क्या फायदा हुआ । न तो बिजली ही मुफ्त मिली और न पानी ही मिल सका । पानी भी दिल्ली और उत्तर प्रदेश को गया और बिजली मुफ्त भी दिल्ली के लोगों को नसीब हुई । तो उत्तराखंड के पहाड़ी नागरिक को क्या मिला ?


सर में गागर पहले भी थी आज भी हैं, रोजगार के साधन पहले भी नही थे और आज भी नही हैं, हाँ, नदियां पहले साफ सुथरी और अच्छे जल स्तर के साथ थी जो आज इन बांधो के बनने से दूषित भी हो गई हैं और प्रभावित भी । विकास के नाम पर पहाड़ी क्षेत्रों में जो कार्य किये भी हैं उनका भी अगर बारीकी से अध्ययन करें तो नुकसान ज्यादा हुआ और फायदा कम, तो क्या ये समझ लिया जाय कि पहाड़ी नागरिक इस राज्य के चंद गद्दारों की राजनीति के लिए बोझ उठाता रहे ।