उत्तराखंड, एक खूबसूरत पहाड़ी राज्य । जहां प्राकृतिक सौंदर्य के साथ साथ सर्वसम्पन्नता व देवी देवताओं का आशीर्वाद पग पग पर विद्यमान है । शरीरिक व बौद्धिक स्तर पर सम्पन्न पहाड़ी क्षेत्र उसकी अनेक विशेषताओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है । हजारों योगियों की उच्च तपस्थली और ज्ञान के स्रोत कहे जाने वाले ऋषि मुनि भी इन्हीं पहाडी जिलों पर अपना समय व्यतित किया करते थे । सैकड़ो वर्षों से इतनी सम्पन्नता के बाद भी आज उत्तराखंड के तमाम पहाड़ी जिले स्कूल शिक्षा जैसी सुविधाओं से या तो वंचित हैं या स्कूल अच्छी शिक्षा देने के योग्य नही हैं ।

तकनीकी के इस दौर में पहाड़ी क्षेत्र के बच्चे कई पीछे खड़े नजर आते हैं । वजह ? स्कूली शिक्षा में अध्यापक व तकनीकी ज्ञान का अभाव होना । आधुनिकीकरण के इस दौर में पहाड़ी क्षेत्र के स्कूलों में बिजली, बैठने के लिए टेबल-कुर्सी, शौचालय जैसी सुविधाओं का न होना दिखाता है कि पहाड़ी क्षेत्र के स्कूल किस दौर से गुजर रहे हैं । प्रदेश के पर्वतीय व ग्रामीण क्षेत्रों में 02 हजार से अधिक स्कूल ऐसे हैं, जिनमें विद्युत कनेक्शन नहीं हैं। इस कारण इन स्कूलों के छात्र कंप्यूटर शिक्षा व विज्ञान सीखने के लिए बुनियादी प्रयोग की सुविधा भी नहीं ले पा रहे हैं।


इससे भी बड़ा माजक तो सरकार ने पहाड़ी क्षेत्र में यह किया है कि एक स्कूल में सम्पूर्ण विषयों पर शिक्षक ही नही रखे हैं । यह मजाक तब और भयावा लगता है जब आपको यह पता चलता है कि पहाड़ी क्षेत्र में चल रहे तकनीकी शिक्षण संस्थान (पॉलीटेक्निक) में भी शिक्षक नही हैं और वहाँ सब कुछ संस्थान में उपस्थित बाबू ही हैं। वही सारी व्यवस्थाएं देखतें हैं और वही परीक्षा भी करवाते हैं। सोचिए, ऐसी शिक्षा से राज्य का युवा कहाँ तक आगे बढ़ पायेगा ? हाँ अगर सिर्फ कागज कठ्ठे करने हैं तो उसके लिए पहाड़ी क्षेत्र के ऐसे संस्थान सबसे बेहतर हो सकते हैं।


जिस राज्य में 20 से अधिक छोटे बड़े बांध (डैम) बिजली बना रहें हो उस राज्य से अगर रिपोर्ट आ रही हो कि उसके 02 हजार स्कूलों में बिजली के कनेक्शन ही नही हैं, तो राज्य के तमाम मुख्यमंत्रियों को एक कटोरे में पानी लेकर उसमें शर्म से डूब जाना चाहिए । उत्तराखंड के जिस नागरिक ने राज्य निर्माण इतिहास पढा होगा उसको यह बात जरूर याद होगी कि इन्हीं दुर्गम क्षेत्रों के बदौलत इन कुर्सी के चाटुकारों को कुर्सी मिली लेकिन उस दुर्गम क्षेत्र को न्याय आज तक नही मिला ।