उत्तराखंड में यौन उत्पीड़न के मामलों में तेजी देखने को मिल रही है। हर दिन कहीं न कहीं से इस प्रकार की खबर आम होने लगी है । 20 % मामलों को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश में शुरुआती दिनों में लड़के और लड़की की रजामंदी से ही दोस्ती आगे बढ़ती है ।


आज कल प्यार सिर्फ उन्ही लोगों में ज्यादा उछाल मारता दिखता है जिनको शरीरिक भूख होती है । जिसे वो प्यार समझ रहे होते हैं वो दरअसल शरीर की महज एक जरूरत भर होती है । उसके पूरा होते ही रिश्ते में एकाएक दरार पड़ने लगती ही और इसकी वजह होती है जिम्मेदारी, जिम्मेदारी जिसको रिस्पांसिबिलिटी भी कहते है । कोई भी लड़की या स्त्री कभी नही चाहती कि उसके स्त्रीत्व के साथ कोई ऐसा व्यक्ति सम्बन्ध रखे जो उसकी जिमेदारी भी न उठा सके । बस यहीं से शुरू होता है सारा खेल ।


आप बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा प्रकरण देख लीजिए । जहां स्त्री को असुरक्षा महसूस होती है वह तुरन्त पुलिस के पास चली जाती है । उससे पहले वह हर सम्भव प्रयास करती है कि उसका रिश्ता बना रह सके लेकिन जब बात बनती नजर नही आती तो मजबूरन उसको खुद की बदनामी की परवाह भी नजर नही आती और वह पुलिस के पास पहुंच जाती है ।


उत्तराखंड में आये दिन ऐसा मामलों में तेजी देखने को मिल रही है । हालांकि अपहरण, जबरन दुष्कर्म जैसे मामले भी हैं लेकिन ऐसे अपराध में उत्तराखंड अन्य राज्यों के मुकाबले पीछे ही है । उत्तराखंड में अधिकांश मामले ऐसे आ रहे हैं जिनमें या तो शादी का झांसा दिया गया था और कई सालों के यौन शोषण के बाद अब लड़का लड़की को अपनाने से मना कर रहा है । या फिर शादीशुदा होने के बाद किसी दूसरी स्त्री से सम्बंध के बाद पुरुष का उसी दूसरी स्त्री को अपनाने से मना करना ।


ऐसे केसों में अगर केवल ये माना जाय की दोषी पुरुष है तो हाँ ये सही है, लेकिन सवाल तो उस स्त्री पर भी है कि आखिर उसने शरीरिक सम्बन्ध से पहले उस पुरुष की पूरी जानकारी क्यों नही हासिल की । एक या दो साल तक किसी पुरुष से सम्बन्ध रखने तक अपने माता पिता से भी रिश्ते की गोपनीयता क्यों बनाई रखी ? आखिर पहले ही क्यो नही साफ किया की मुझे उस लड़के से शादी करनी है ? बस लड़की की एक गलती और फिर उसकी लड़ाई में वह अकेली पड़ जाती है । इसलिए जागो उत्तराखंड जागो, अपनी संस्कृति और आदर्शों को जगाओ ।