जी हाँ सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा होगा लेकिन सच यही है । मैदानों में विकास तो हुआ पर मानव जाती के लिए जरूरी मानकों का विनाश भी हुआ । नदियों की जो पवित्रा पहाड़ों पर है वह मैदानी इलाकों में आने पर दूषित हो जाती है । उत्तराखंड में पर्यटन के नाम पर जो भद्दा मजाक सरकारों ने किया उससे अब गंगा का पानी ऋषिकेश में साफ नही बचा । एक रिसर्च के अनुसार चौरास स्थित डैम निर्माण के बाद श्रीनगर में बह रही अलकनंदा का पानी भी पीने योग्य नही बचा हुआ है ।


यही वजह है कि लोग अब गंगा जल के नाम पर सिर्फ हिमालय क्षेत्र में उद्गम स्थानों के जल को प्राथमिकता देने लगे हैं। इसके लिए मैदानी इलाको के यजमान अपने पुरोहितों से सम्पर्क करते हैं और साफ स्वच्छ गंगा जल मंगवाते हैं। गंगा के तीर्थ पुरोहितों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में अपने यजमानों के घर जाकर उन्हें पवित्र गंगा जल उपलब्ध कराने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। अब गंगा जल कारोबार का रूप लेता जा रहा है।


इसके लिए उत्तराखंड डाक विभाग भी पवित्र गंगा जल को देश दुनिया में लोगों तक पहुंचाने में जुटा है। अक्तूबर 2018 में मुख्य डाकघर उत्तरकाशी में बॉटलिंग प्लांट लगाकर यहां से गंगोत्री के गंगा जल की आपूर्ति की जा रही है। उत्तरकाशी के पोस्टमास्टर राकेश रजवार ने बताया कि विभाग गंगोत्री से बड़े टैंकरों में गंगा जल उत्तरकाशी ला रहा है। यहां डाकघर में बने बॉटलिंग प्लांट में गंगा जल को तीन चरण में फिल्टर कर इसे 30-30 मिलीलीटर की बोतलों में पैक किया जा रहा है। यहां से गंगा जल देहरादून भेजा जाता है।


डाक विभाग द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक वर्ष 2018-19 में 1,35,600 बोतल,वर्ष 2019-20 में 4,44,816 बोतल और वर्ष 2020-21 में 2,64,480 बोतल भेजी जा चुकी हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में डाकघरों के माध्यम से इसे 30 रुपये प्रति बोतल की दर से बेचा जा रहा है। इस कार्य में बीस स्थानीय युवाओं को रोजगार मुहैया कराया गया है।