केंद्र सरकार ने भारत को डिजिटल बनाने की मुहिम का छेड़ी की उत्तराखंड राज्य ने तुरन्त ही इस फैसले का पालन बिना ये सोचे कर लिया कि इसका अंजाम क्या होगा । कहते हैं ना जो डेढ़ स्याना होता है वो खुद के साथ दूसरे को भी ले डूबता है । यही हाल कुछ उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्र में चल रहे मनरेगा कार्य का हो रखा है, मौजूदा रावत सरकार में । पहले तो कोरोना काल में घर आये युवाओं को रोजगार केनाम पर मनरेगा का पाठ पढ़ाया और जब पढ़े लिखे युवाओं ने विवश होकर बेलचा-कुदाल उठाया तो अब उनकी मेहनत के बदले ठेंगा दिखा के आराम से बैठे हुए हैं।


ऐसी ही एक खबर उत्तराखंड के टिहरी जिले से निकल के आ रही है जहां ग्राम प्रधानों ने मनरेगा का भुगतान न होने पर और भुगतान की राशि के लिए दर-दर भटकने का आरोप लगाते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है । गौरतलब है कि सरकार ने डिजिटल भारत मुहिम को यह सोचकर लागू तो किया कि इससे घोटाला नही होगा लेकिन भुगतान में हो रही देरी से लोगों का मनरेगा से भरोसा उठ जाएगा इसका आंकलन नही किया ।

टिहरी में ग्राम प्रधानों का जोरदार विरोध 


लंबे समय से मनरेगा कार्यों का भुगतान न होने पर ग्राम प्रधानों ने आक्रोश व्यक्त किया है। प्रधान संगठन के जिला अध्यक्ष रविंद्र राणा ने कहा कि दैनिक और कुशल श्रमिकों के खाते में मजदूरी की धनराशि जमा नहीं हो पाई है, जिस कारण उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। पूर्व अध्यक्ष महावीर सेनवाल ने कहा कि वर्कआडर के आधार पर ग्राम पंचायतों में मनरेगा के तहत सार्वजनिक रास्तों, पेयजल योजना, सिंचाई नहरों का पूर्व में कार्य किया गया है। लेकिन भुगतान पाने के लिए जनप्रतिनिधियों और श्रमिकों को दर-दर भटकना पड़ रहा है। जल्द लंबित भुगतान न होने पर उन्होंने आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी है। वहीं, खंड विकास अधिकारी दुर्गा प्रसाद थपलियाल ने बताया कि 87 लाख का लंबित भुगतान का मामला संज्ञान में है। बजट उपलब्ध होने पर भुगतान की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।



आपको बता दें कि मनरेगा में भुगतान की प्रक्रिया को दो चरणों में पूरा किया जाने लगा है। पहले लोगों की मजदूरी प्रधान के हाथों से ही वितरित की जाती थी लेकिन अब सरकार पैसा सीधे लोगों के खातों में भेज देती है लेकिन कुछ ग्रामसभाओं में दिक्कतों की वजह से अभी भी यह प्रक्रिया उसी प्रकार से की जा रही है । हाँ, यह सच है कि इस प्रक्रिया में प्रधान घपला कर देते थे लेकिन आज की स्थिति को देखते हुई तो लगता है वही प्रक्रिया सही थी क्योंकि छह-छह माह गुजर जाने के बाद भी लोगों को कार्य की राशि प्राप्त नही हो रही जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में नागरिकों को आजीविका के लिए जूझना पड़ रहा है । सरकार की नीति से अगर आम जनता परेशान हो तो सरकार को उस नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए ।