उत्तराखंड में जंगली जानवरों का आतंक थमने का नाम नही ले रहा। वन विभाग हाथ पे हाथ रखे ग्रामीणों का तमाशबीन बना हुआ है। कुमाऊँ में गुलदार ने एक बाद एक तीन महिलाओं को मौत के घाट उतारा लेकिन विभाग से1 अब तक गुलदार नही पकड़ा गया। इसी तरह गढ़वाल में पिछले हफ्ते ही एक बुजुर्ग को भालू ने छती पहुंचाई बाबजूद इसके कोई ठोस कदम नही उठाया गया नतीजा एक और महिला पर भालू का हमला। एक तरफ पलायन रोको को लेकर चर्चा है तो दूसरी तरफ जंगली जनवरों को लेकर कोई ठोस नीति नही है।
वन विभाग ने पूर्व में हुई घटना से सबक नही लिया उसी का खमियाजा है कि चमोली गढ़वाल में ही भालू के हमले में एक महिला गम्भीर रूप से घायल हो गई। बताया जा रहा है कि महिला मवेशियों को घास लेने के लिए जंगल में गई हुई थी इसी दौरान भालू ने महिला पर हमला कर दिया। ब्लॉक के सवाड गांव में भालू ने एक महिला को गंभीर रूप से घायल कर दिया। पीएचसी देवाल में प्राथमिक उपचार के बाद महिला को बेस अस्पताल श्रीनगर रेफर कर दिया गया।

सवाड़ गांव की कमला देवी (47) पत्नी हरेंद्र सिंह मंगलवार सवेरे गांव की अन्य महिलाओं के साथ पास के जंगल में पशुओं के लिए घास लेने गई थी। इसी दौरान भालू ने उस पर हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया। कमला देवी के शोर मचाने पर साथ में गई महिलाओं महेशी देवी, हेमा देवी, किरन, प्रभा, सीमा ने भालू को वहां से भगाया। इसके बाद फोन से अन्य ग्रामीणों को घटना की जानकारी दी। मौके पर पहुंचे ग्रामीण महिला को सड़क तक लेकर आए इसके बाद 108 वाहन की मदद से कमला को पीएचसी देवाल पहुंचाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टर ने महिला को श्रीनगर बेस अस्पताल रेफर कर दिया।

महिला जीवन और मौत के बीच जंग लड़ रही है। भालू के बढ़ते हमलों को देखते हुए ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। पीएचसी के डॉ. मनोज कुमार ने बताया कि महिला के सिर सहित पूरे शरीर पर भालू ने गहरे जख्म किए हैं। वन विभाग घायलों को मुआवजे के नाम पर पांच से दस हजार रुपये पकड़ा देता है लेकिन भालुओं से सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम नही किया जाता है। न केवल भालू बल्कि जंगली सूअर और बंदरों से भी पहाड़ी क्षेत्र को निजात दिलवाने में वन विभाग विफल नजर आता है।

सरकार एक तरफ तो पलायन पर बात करती है लेकिन दूसरी तरफ पहाड़ी क्षेत्र में कठिन जीवनशैली को लेकर कोई ठोस रणनीति नही बनाती है। आज पहाड़ो पर खेती बहुत कम रह गई है और इसकी बड़ी वजह हैं जंगली जानवर। फलों को बंदर नही छोड़ते और खेती को सूअर तो ऐसे में पहाड़ी नागरिक असुविधाओं के बीच में रहे भी तो किस लिए। करोडों रुपये वन विभाग पर खर्च किया जाता है इसके बाबजूद भी वन विभाग पहाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों में कोई सहायता वाला कार्य नही करता है। बीते दो माह से पहाड़ी क्षेत्रो में लगी आग से जंगल जलकर राख हो गये लेकिन विभाग के पास कोई पुख्ता इंतजाम न होने से आग लगातार धधक रही है। क्या ऐसे होगा पहाड़ो का विकास ? या इस प्रकार रुकेगा पलायन।