उत्तराखंड समाचार: केंद्र सरकार ने मनमाने ढंग से जो कृषि बिल पास किया उसके विरोध में किसान अब और भी उग्र हो गये हैं। भाजपा सरकार पर आरोप है कि 26 जनवरी को सुनियोजित ढंग से किसानों को बदनाम करने का प्लान भी केंद्र की मोदी सरकार ने ही बनाया था। राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने वाला भी जब भाजपा का कार्यकर्ता निकला तो उसकी गिरफ्तारी नही की गई। इससे किसान और आक्राम हो गए। केंद्र सरकार का तानाशाही रूख यहीं नही थमा तो उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं को किसानों को भगाने के लिए कहा लेकिन दाव उल्टा पड़ गया। अंध भक्तों को छोड़कर लोग खुलकर किसानों के समर्थन में आगे आने लगे हैं। भाजपा जिस तरीके से पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाना चाहती थी अब आम जनता समझने लगी है। इस आंदोलन से कहीं न कहीं मोदी की साफ छवि को भी दाग लग गया है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ भाजपा नेता भी बगावत पर उतर आए हैं। पंजाब अकाली दल पहले ही इस बिल का विरोध कर चुका है।

अब हरियाणा के नेता भी कृषि कानून का विरोध और किसानों का समर्थन करने लगे हैं। बीते साल शुरू हुए किसान आंदोलन के कारण हरियाणा सरकार पर खतरे के सियासी बादल मंडरा रहे थे। हरियाणा सरकार में निर्दलीय विधायकों में से कईयों ने कृषि कानूनों का खुलेआम विरोध किया। शुक्रवार शाम हरियाणा में इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला ने विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर किसानों का समर्थन करने का ऐलान किया है। अब हरियाणा के पूर्व मुख्य संसदीय सचिव रामपाल माजरा ने भी किसानों के समर्थन में भाजपा छोड़ने की घोषणा की है। उन्होंने चंडीगढ़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा छोड़ने पर आधिकारिक रूप से फैसला सुनाया है। आपको बता दें कि इनेलो विधायक अभय सिंह चौटाला के बाद हरियाणा में रामपाल माजरा दूसरे ऐसे बड़े नेता हैं। जिन्होंने किसानों के समर्थन में इस्तीफा दिया है। शुक्रवार को रामपाल माजरा ने अभय सिंह चौटाला द्वारा उठाए गए कदम की सराहना भी की थी।

उत्तर प्रदेश सरकार में भी बिल के विरोध में आवाज उठ रही हैं लेकिन यहां सरकार पूर्ण बहुमत में है इसलिए खबरे बाहर नही आ रही हैं। मुख्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस वक्त चोर की भूमिका में नजर आ रहा है। आप किसी भी चैनल को खोल लीजिए, उनके पत्रकार इस तरह से खबरें पेश करते हैं जैसे किसान नही बल्कि आतंकवादियों के बारे में बात कर रहे हों। जब यह बिल संसद में बिना बहस के पास हुआ तब इन्ही पत्रकारों में से एक का दम नही पड़ा कि सरकार से सवाल पूछे, उल्टा गलत बिल को सही साबित करने की कोशिश में पूंजीपतियों के तलवे चाटते नजर आये। अगर इन्ही पत्रकारों का ज्ञान परीक्षण किया जाय तो कुछ को यही नही पता होगा कि कौनसी फसल उगाने के लिए किस-किस प्रक्रिया से गुजरना होता है, लेकिन इस देश की बदकिस्मती है कि जिसने कभी मिट्टी में हाथ भी नही रखा वह भी कृषि बिल की विशेषताओं को दिल्ली और मुम्बई के कंक्रीट भवनों में बैठकर बताता है।

लेकिन किसान तो किसान है, जो जमीन को हल फाड़ सकता है वो अपनी समस्याओं का हर परिस्थितियों में हल भी निकाल सकता है। दिल्ली में किसानों का पानी बन्द किया गया तो उत्तराखंड किसान संगठन ने पहाड़ो का शुद्ध पानी किसानों के लिए भेज दिया है। कृषि कानूनों के विरोध में गाजीपुर बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन में शामिल लोगों के लिए भाकियू कार्यकर्ता 12 गांवों से पीने का पानी लेकर वहां पहुंचे। कार्यकर्ता अपने साथ वहां धरना दे रहे किसानों के लिए दो गाड़ियों में राशन आदि भी लेकर गए हैं। भाकियू के प्रदेश अध्यक्ष (यूथ विंग) रविंद्र सिंह राणा ने बताया कि आंदोलन को कुचलने के लिए केंद्र सरकार ने गाजीपुर बॉर्डर पर पानी की सप्लाई रोक दी थी। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे राकेश टिकैत ने कार्यकर्ताओं से गांवों से वहां पानी पहुंचाने का आह्वान किया था। जिसके बाद शनिवार को काशीपुर के 12 गांवों से किसान दो गाड़ियों में पीने का पानी और राशन लेकर गाजीपुर बार्डर पहुंच गए हैं।

स्वत्रंत भारत में यह पहली सरकार है जो शायद जीने के अधिकार को भी तबजु नही देती है। जीने के लिए अवश्य वस्तुओं की सप्लाई को रोकने का मतलब है कि सरकार खुद में भयभीत है। जिस देश में किसान और जवान अग्रिम भूमिका में हैं वहां आज किसानों से डर लग रहा है या लोगों को किसानों के नाम पर डराया जा रहा है तो कहीं न कहीं सरकार अपनी नाकामी को छुपा रही है। सरकार जनता के द्वारा चुनी जाती है इसलिए सरकार का फर्ज है कि वह देश के हर नागरिक की बात को सुने और यही गणतंत्र राष्ट्र का मतलब भी है। जहां सरकार सही है सीना ठोक के समर्थन कीजिए लेकिन जहां गलत है वहाँ सरकार का विरोध होना भी जरूरी है और एक अच्छी सरकार को स्वीकार करना चाहिए न की उसका विरोध।