उत्तराखंड राज्य में आलवेदर सड़क को लेकर क्या क्या सपने नही दिखाए गये थे। लेकिन हकीकत बिल्कुल उन सपनों से विपरीत है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सच दिखाने से डरता है और सरकार के इशारों पर कार्य करता है, यही वजह है कि बदहाल अवस्था में पड़े बद्रीनाथ आलवेदर सड़क परियोजना पर कोई सुद लेने वाला नही है। हालत इतने बत्तर हो गये हैं कि इन मार्गों पर नित्य चलने वाले वाहन चालक स्वयं ही सड़क पर पड़े गड्ढों को मिट्टी से भरने के लिए मजबूर हैं। वजह ! वजह यह है कि अगर कल को इन्ही चालक में से किसी का वाहन दुर्घनाग्रस्त होता है तो उसका पूरा दोष वाहन चालक को ही दिया जाएगा न की उन कम्पनियों को जो निजी लाभ के लिए सड़क पर कार्यरत हैं। ऐसा होना स्वभाविक भी है क्योंकि चार धाम सड़क परियोजना के चलते जिन लोगों के नुकसान हुए, जाने गई उन पर सरकार का ढुलमुल रवैया ही देखने को मिला है।

उत्तराखंड के पहाडी क्षेत्र को विकास के नाम पर विनाश के मुह में धकेला जा रहा है। विकास की भी तो कुछ सीमाएं होंगी या बस मिट्टी खोदो और कहीं बांध बना दो और कहीं टूटी फूटी सड़क। विकास का अगर सही से वर्गीकरण नही किया गया तो इसके आने वाले दिनों में गम्भीर परिणाम देखने को मिलेंगे। स्कूल शिक्षा इसी का जिताजागत उदाहरण हैं। हर गाँव में स्कूल की चाह में जो स्कूल शिक्षा का हाल हुआ वह किसी से छुपा नही है। इसके दो बड़े दुष्परिणाम यह हुए कि स्कूलों में छात्र संख्या में भारी गिरावट आयी और दूसरा राज्य में पहले से चल रही शिक्षकों की कमी चार गुनी बढ़ गई। क्योंकि स्कूल तो बढ़ा दिए लेकिन शिक्षक उतने ही रहे, परिणामस्वरूप एक स्कूल में एक ही शिक्षक रह गया और कहीं दो तो कहीं चार। समय पर सही नीति बनाई होती और स्कूलों को एकीकरण कर शिक्षक संख्या बढ़ाई होती तो आज शायद ये दिन न देखने पड़ते।

अब यही स्थिति अन्य क्षेत्र के विकास कार्यों में दोहराई जा रही है। पहाड़ क्षेत्र उत्तराखंड का वह अमूल्य और अक्षुण स्रोत था जिसको सही तरह से विकसित कर राज्य को देश में पहले स्थान पर लाया जा सकता था, लेकिन महज विकास कह देने भर से या चुनाव के चलते राज्य को एक दो क्षेत्रों में पहला दूसरा स्थान देने भर से विकास नही हो जाता है। आज का विकास आपके आने वाली 50 पीढ़ियों को कहाँ पर स्थापित करेगा, यह आज की राजनीतिक मानशिकता को उस समय भी महान लगना चाहिए। आज जैसे हम अपने पूर्वजों के महान कार्यों से प्रभावित हैं ठीक उसी प्रकार राज्य में आने वाली पीढियां भी मौजूदा राजनीतिक कृतियों से प्रभावित होनी चाहिए।

राज्य बनने के महज 20 वर्षों में राज्य को जो झटका लगा है उसकी समीक्षा गहनता से करने की आवश्यकता है। आज के विकास कार्यों को आप इस तरह से परिभाषित नही कर सकते हैं कि सड़क बनाने वाला तो लाभ में है और सड़क पर वाहन चलाने वाला घाटे में। पहाड़ में एक बहुत प्रसिद्ध वाक्य है - "सभी दीदा ही दीदा छन, त भुला कोच" अर्थात अगर सभी खुद को बड़ा समझते हुए समाजिक हितों को ताक पर रखेंगे तो फिर समाज बचाने वाला रहेगा कौन ? विकास की दौड़ में आपसी सम्बन्ध और समाजिक सौहार्द ही समाप्त हो जाएगा तो विकास का क्या करेंगे आप। मान लीजिए आपको सरकार 7G इंटरनेट स्पीड देदे और आप माइक्रो सेकंड में ही सब कुछ खोल लें लेकिन आपके आस पास एक भी पक्षी न दिखे तो क्या आप उसको विकास कहेंगे? एक पल के लिए कोई असाक्षर हाँ भी कह देगा लेकिन जिसनें बायोलॉजिकल साईकल पढ़ा होगा वह समझ जाएगा कि इन पक्षियों की भी इस संसार में उतनी ही अहम भूमिका है जितनी की इंसान की। 

बात विकास कार्यों की हो रही है। ऐसा विकास जिसके लिए बहुत बड़ा सपना दिखया गया लेकिन जब सच दिखता है तो सपना झूठा लगने लगता है। यही कुछ हुआ 25 जनवरी को बद्रीनाथ हाइवे पर, ऐसा हाइवे जिसको किसी भी विषम मौसम/परिस्थिति के लिए तैयार किया जाना था लेकिन चार साल बाद भी उस सड़क पर चलने वाले चालक अब स्वयं ही चमोली बाजार से पीपलकोटी तक सड़क के बीचोंबीच हुए गड्ढों को मिट्टी व पत्थर से भर रहे हैं। सरकार ने प्रयास किया इसमें कोई दोहराई नही है लेकिन बात फिर वहीं आ जाती है कि आपने सिर्फ विकास सोचा, विकास कैसा चाहिए ये नही सोचा। इस प्रोजेक्ट पर अब तक सरकार ने कितना रुपया खर्च किया इस रिपोर्ट को पढ़िए और आंकलन कीजिए ?