अब लगलू मंडाण - ढोल दमों को लेकर सरकार ने दिखाई सकारात्मकता, उठाए ये कदम ।


उत्तराखंड में ढोल-दमों उत्तराखंड संस्कृति के मुख्य वाद्य यंत्रों में से हैं। अन्य राज्य की तरह उत्तराखंड में भी दूसरे वाद्य यंत्रों के आ जाने से उत्तराखंड के ढोल दमों वादन शैली और यहाँ तक की वादन करने वालों में भारी गिरावट देखने को मिली है। उत्तराखंड के लोगों ने अपनी संस्कृति को महत्व न देकर बाहरी राज्यों के बैंड बाजों को प्राथमिकता देनी क्या शुरू की तो ढोल दमों का वादन करने वालों के आगे रोजी रोटी का संकट गहराने लगा, और अंजाम यह हुआ कि लोगों से इस कला को अपनी नई पीढ़ी को देना छोड़ दिया। आज यह स्थिति है कि अधिकांश लोगों को ढोल विद्या का पूर्ण ज्ञान नही है।

आज राज्य में ढोल वादकों की ही बात करें तो वर्तमान में इनकी संख्या अंगुलियों में गिनने लायक रह गई है। वजह ये कि राज्याश्रय के अभाव और इस लोककला को रोजगार से न जोड़े जाने के कारण यह विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही है। ढोल वादन का पारंपरिक ज्ञान पुरानी पीढ़ी के साथ ही सिमट रहा है। नई पीढ़ी इसमें खास रुचि नहीं ले रही है तो इसके पीछे रोजगार का संकट भी सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। प्रदेशभर में ढोल वादकों की संख्या बेहद कम रह गई है। आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। सरकार की ओर से ढोल वादकों को प्रतिमाह दी जाने वाली तीन हजार रुपये पेंशन का ही जिक्र करें तो महज 91 ढोल वादक ही पेंशन ले रहे हैं।

लेकिन अब सरकार ने इस दिशा में सकारात्मकता दिखाई है। हालांकि वर्षों पहले गढ़गायक प्रीतम भरतवाण ने इस दिशा में सरकार का ध्यान अपनी तरफ खींचा था लेकिन बीच में उनके प्रयासों में भी स्थिरता सी बन गई, शायद उनको सरकार का वह सहयोग हासिल नही हुआ जिसको वह पाना चाहते थे। किन्तु देर से ही सही उत्तराखंड की समृद्ध लोकविरासत को संजोए रखने के मद्देनजर सरकार संजीदा हो गई है। इस कड़ी में पारंपरिक ढोल वादकों के उत्थान और उनके कला कौशल को संरक्षण-प्रोत्साहन देने के लिए नि:शुल्क वाद्य यंत्रों और पांरपरिक वेशभूषा का वितरण समेत अन्य कदम उठाए जा रहे हैं।

संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज के अनुसार प्रदेश के गांवों में निवासरत ढोल वादकों के पुनरुत्थान और उनके कला कौशल को संरक्षण व प्रोत्साहन के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। अनुसूचित जाति उप योजना के अंतर्गत गुरु शिष्य परंपरा के तहत मूर्धन्य गुरुओं के द्वारा प्रदेशभर में विभिन्न स्थानों पर छह माह के प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।

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