उत्तराखंड स्कूली शिक्षा में शामिल हो आंदोलन ककोडाखाल का नाम- रावत


उत्तराखंड राज्य में कई आंदोलनों का जिक्र मिलता है लेकिन आपने कभी ककोड़ाखाल का नाम नही सुना होगा। इसकी वजह यह है कि इस आंदोलन के बारे में बहुत कम ही लोगों को जानकारी है। और न ही इस आंदोलन को कहीं पुस्तकों में जगह मिल पाई। लेकिन राजनीतिक गलयारों में जब कभी हलचल होती है तो फिर कुछ पुराने जख्म भी हरे हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ जब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत गढ़केशरी स्व. अनसूया प्रसाद बहुगुणा सहित अन्य आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे।

दरअसल आज उत्तराखंड की प्रसिद्ध प्रथा कुली बेगार प्रथा के विरोध के 100 वर्ष पूरे होने पर ग्राम पंचायत नाग-ककोड़ाखाल में शताब्दी वर्षगांठ समारोह आयोजित किया गया। इस मौके पर स्कूली बच्चों द्वारा देशभक्ति गीतों के साथ ही कुली बेगार प्रथा पर नाटक का मंचन भी किया गया, जो मुख्य आकर्षण रहा। यहाँ बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे थे पूर्व सीएम रावत । इसके अलावा केदारनाथ के विधायक मनोज रावत व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मातबर सिंह कंडारी समेत क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता भी वहां मौजूद रहे।

यहां मंच से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कुली बेगार प्रथा को खत्म करने और ककोड़ाखाल आंदोलन के बारे में कहते हुए बताया कि कुली बेगार प्रथा को खत्म करने के लिए अनसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में ककोड़ाखाल से पहली आवाज उठी थी। आजादी से पूर्व गढ़वाल का यह पहला स्वतंत्रता आंदोलन था, जो कभी नहीं भुलाया जा सकता है। इस आंदोलन से नई पीढ़ी को रूबरू कराने के लिए सभी को मिलकर कार्य करना होगा। इसके लिए यह स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल होना चाहिए।पूर्व सीएम ने कहा कि उस समय के आंदोलनकारियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा और उनके भव्य स्मारक बनने चाहिए।

इस मौके पर स्वर्गीय श्री अनसूया प्रसाद बहुगुणा के पौत्र समीर बहुगुणा भी वहां मौजूद थे। उन्होंने सरकार के द्वारा शताब्दी वर्ष पर भी याद न किये जाने को लेकर अफसोस जाहिर किया। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन के आंदोलनकारियों को भूल जाना उनका अपमान करने के बराबर है।

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