इसको आप उत्तराखंड राज्य की बदकिस्मती ही समझये कि एक तरफ तो केंद्र डिजिटल इंडिया की बात करता है और दूसरी तरफ डबल इंजन सरकार के पास राज्य में ऑनलाइन परीक्षाओं को सम्पन्न करवाने के लिए पर्याप्त कम्प्यूटर ही नही हैं। खैर कम्प्यूटर तो बाद की बात है उससे पहले तो तकनीकी कॉलेजों में पूर्ण शिक्षक ही नही हैं। लेकिन मजेदार बात है कि महज चार साल में प्रदेश सरकार खुद को ऐसे परिभाषित करती है जैसे इन्होंने राज्य का कितना विकास कर दिया हो। राज्य में ले देकर चार धाम सड़क और रेलवे लाइन ही नए कार्य हुए हैं जो राज्य सरकार नही बल्कि केंद्र की बदौलत बन रहे हैं। इन प्रोजेक्ट पर भी काम करके सरकार ने जनता पर कोई उपकार नही किया उल्टा टोल टैक्स लगाकर किराए में बढ़ौतरी कर लूटने का काम किया है।

स्कूलों के विकास की बात करने वाली भाजपा सरकार के राज में अकेले चमोली जिले में 80 स्कूलों में से 63 में प्रधानाचार्य ही नही हैं। अगर इन स्कूलों में तकनीकी ज्ञान के लिए कम्प्यूटर होंगे भी तो यह जिम्मेदारी कौन तय करेगा कि कंप्यूटर की कक्षाएं सही से संचालित हो भी रही हैं या नही। पिछले चार सालों में न तो स्कूलों का एकीकरण कर उनको मजबूत करने की बात सामने आई है और न ही शिक्षकों की दशा सुधारने की बात सामने आई है। सरकार कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बन्द तो कर रही है लेकिन छात्र संख्या में कैसे सुधार किया जाय इस ओर कोई ध्यान नही है।

राज्य में तकिनकी कॉलेजों की क्या स्थिति है इसी बात से पता चल जाता है कि राज्य में ऑनलाइन परीक्षाएं सम्पन्न नही हो सकती हैं। राज्य में निजी और सरकारी मिलाकर तकनीकी कॉलेजों की ठीक ठाक संख्या है। इसके अलावा कई ऐसे स्कूल भी हैं जिनके पास इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी नही है। इसके बाद भी अगर सरकार के पास ऑनलाइन परीक्षा करवाने के लिए पर्याप्त कम्प्यूटर नही हैं तो प्रदेश की तकिनकी शिक्षा ही कठघरे में है। क्या राज्य के पॉलीटेक्निक कॉलेजों में कम्प्यूटर नही हैं ? अगर नही है तो कम्प्यूटर साइंस जैसी तकनीकी शिक्षा का अंचलन कैसे हो रहा है। कहीं ऐसा तो नही कि तकनीकी ज्ञान की जगह बच्चे थ्योरी रट के पेपर पास कर रहे हों और उसी को विकास माना जा रहा हो। डिजिटल इंडिया की अहम भूमिका में जो पहला या द्वितीय कारक है जब वही राज्य में पर्याप्त नही है तो नेता किस मुह से विकास का दावा कर रहे हैं, यह सोचने वाली बात है।