उत्तराखंड समाचार: पुरानी पेंशन योजना को लेकर तेज होगी आवाज, बाजार के तहत नही चलगी सरकारी विभागों की पेंशन ।


उत्तराखंड राज्य ही नही बल्कि पूरे भारत में जबसे पेंशन व्यवस्था को हटाया गया है इसके दुष्प्रभाव देखने को मिले हैं। दरअसल यह उस व्यक्ति की असल पूंजी है जिसने सरकार को दी हुई सेवाओं के बदले में अपने बुढापे की सुरक्षा मांगी है। लेकिन पेंशन बन्द होने से कई जगह देखा गया है कि पुत्र अपने बुजुर्ग माता पिता को छोड़कर कहीं और अन्य शहरों का रुख कर देते हैं ऐसे में न उनके पास पैसा बचा और न औलाद। पेंशन बुढापे का सहारा है जो कर्मचारी अपने सेवा काल में अनेक प्रकार के टैक्स चुकाने के बाद हासिल करता है। सरकारों ने वेतमान आयोग तो लगाए लेकिन उसका फायदा केवल आज में है। उस पैसे से किसी का कल सुरक्षित होगा यह नही कहा जा सकता है। मान लीजिए किसी के बच्चे छोटे हैं और घर में कमाने वाला एक ही व्यक्ति है। अचानक किसी वजह से उसकी मौत हो जाती है तो परिवार का भरण पोषण कैसे चलेगा।

इस प्रकार के अनके मुद्दों के साथ उत्तराखंड में पुरानी पेंशन व्यवस्था की मांग तूल पकड़ती जा रही है। इसके लिए अब शिक्षक संघ भी जंग में कूद पड़ा है । पुरानी पेंशन बहाली को लेकर पुरानी पेंशन बहाली मंच आंदोलन तेज करते हुए जल्द ही संगोष्ठी, रैली व धरना का आयोजन करेगा। मंच के जिलाध्यक्ष सौम्य ढौंड़ियाल ने बताया कि सरकार से लंबे समय से पुरानी पेंशन बहाली की मांग की जा रही है, लेकिन अभी तक मांग को अनसुना किया जा रहा है। कहा कि अक्तूबर 2005 से तैनात शिक्षक/कर्मचारियों को पेंशन से वंचित रखा गया है। साथ ही जो पेंशन व्यवस्था की गई है, वह बाजार के तहत है, जिसका सेवानिवृत्त होने पर शिक्षक/कर्मचारियों को कोई लाभ मिलने वाला नहीं हैं।

बात भी सही है जनता के पैसों पर पलने वाले नेता जब पेंशन ले सकते हैं, वह भी एक नही कई सारी तो फिर आम जनता के लिए दरवाजे बन्द क्यों? सरकारी कर्मचारी ने कम से कम रेल सेवा, हवाई सेवा और बस सेवा जैसी सुविधाओं का फ्री में उपभोग तो नही किया। पेंशन योजना एक सरकारी कर्मचारी की सेवाओं का ईनाम स्वरूप है जिसको लेने का हर एक सरकारी कर्मचारी को अधिकार है। बुढ़ापे और परिवार की सुरक्षा को वेतनमान जैसी सुविधाओं के भरोसे नही छोड़ा जा सकता है।

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