दरअसल उत्तराखंड सरकार ने 03 वर्ष पूर्व 50 वर्ष से अधिक उम्र के शिक्षकों और अधिकारियों को फिटनेस के आधार पर सीआरएस देने का निर्णय लिया था। लेकिन मजेदार बात यह है कि पिछले तीन साल से इस दायरे में 1% शिक्षक-अधिकारी भी नही आ रहे हैं । अनुशासनहीनता, भ्रष्ट आचरण सीआरएस के लिए मुख्य मानक है। इसके साथ ही गंभीर रूप से बीमार, जटिल दिव्यांगता की वजह से दायित्वों का निर्वहन करने में अक्षमता को भी सीआरएस का पात्र माना गया है। सबंधित कार्मिक का दस साल के सेवा रिकार्ड के आधार पर ही निर्णय लिया जाता है।


पिछले तीन सालों से शिक्षा विभाग सभी अधिकारी-कार्मिक और शिक्षक को पूरी तरह से फिट और योग्य बताता आ रहा था। इस साल सरकार के सख्त रूख के चलते सभी जिलों में कार्मिकों की गंभीरता से स्क्रीनिंग की गई है। बाकी जिलों में कार्मिकों को सेवा योग्य पाया गया है। कुमाऊं मंडल में भी सभी शिक्षक-कार्मिक फिट मिले हैं। अपर निदेशक-कुमाऊं डॉ. मुकुल कुमार सती ने इसकी पुष्टि की। लेकिन गढ़वाल मंडल के टिहरी जिले में एक शिक्षक को सरकारी सेवा के लिए अनुपयोगी पाया गया है।


प्रदेश के 60 हजार से ज्यादा कार्मिक-शिक्षकों में केवल एक ही चिह्नित करने पर सवाल भी उठ रहे हैं। दरअसल, गंभीर बीमारी के नाम पर हर साल सैकड़ों की संख्या में शिक्षक तबादले के लिए आवेदन करते हैं। नैनीताल, हरिद्वार और नैनीताल में इस वजह से स्वीकृत पदों से ज्यादा शिक्षक हो चुके हैं। यही स्थिति अधिकारियों की भी है। बीमारी के नाम पर कई बार उच्च अधिकारियों ने भी सरकार के तबादले के आदेशों को पालन नहीं किया। कुछ अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल तक जा चुके हैं। इस पूरे प्रकरण पर खुद शिक्षकों का कहना है कि अगर जाँच निष्पक्षता से होती तो यह संख्या कई ज्यादा होती लेकिन राजनीतिक लीपापोती में सब पाक साफ है ।