भारत में लगभग 02 से 03 लाख अफगानिस्तानी नागरिक पिछले कई वर्षो से शरण लिए हुए हैं। गौरतलब है कि ये सभी नागरिक अपने देश में होने वाले अत्याचार और पाकिस्तान द्वारा किये जाने वाले दुर्व्यवहार से परेशान होने के बाद ही भारत में आये हैं। दुनियां में कई मुस्लिम देश होने के बाबजूद भी इन शरणार्थियों का मानना है कि भारत सबसे शांतिप्रिय देश है। यहां हर जाती धर्म के लोग मिलबांटकर रहना जानते है। लेकिन आज अचनाक ऐसा क्या हुआ कि लॉकडाउन के बाद से इन्हीं शरणार्थियों को लगने लगा है कि भारत में रहे तो भविष्य खराब हो जाएगा। जी हाँ, अफगानी युवाओं का मानना है कि भारत में न तो उनके लिए उचित शिक्षा है और न ही रोजगार। दिल्ली में अफगानी उच्चायुक्त के आगे धरना दे रहे इन शरणार्थियों का कहना है कि भारत में अब अपने ही युवाओं को रोजगार देने की क्षमता नही है तो फिर भारत अफगानिस्तानी शरणार्थियों को कैसे नौकरी दे सकेंगे लिहाजा उनके आगे रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। कोरोना महामारी के चलते रोजगार चला गया तो मकानमालिकों को किराया देने के लिए भी पैसे नही है। ऐसे में यह लोग मांग कर रहे है कि भारत सरकार अगर उनको भगाना चाहती है तो जल्दी से फैसला लें और यही सवाल उनका अफगानिस्तान के भारतीय उच्चायुक्त से भी है कि उनको किसी दूसरे देश में भेजा जाय।

भारत में अपनी मांगों को रखने का तरीका बदल गया है लिहाज अब बिना विरोध प्रदर्शन के सरकारें किसी समाज, समुदाय या समूह की समस्याओं पर ध्यान नही देती हैं। यही वजह है कि लोग खुद को प्रकाश में लाने के लिए देश विरोधी नारों का समर्थन तक लेने लगे हैं। फिलहाल अफगानी शरणार्थियों ने तो ऐसा कुछ नही किया है लेकिन अपने भविष्य को अंधकार में देश उन्हें भी भारत से निराशा नजर आने लगी है। युवा अफगानिस्तानियों का कहना है कि भारत में उनकी शिक्षा के लिए उचित प्रबन्ध नही है। स्कूली शिक्षा के लिए भी उनसे अधिक शुल्क वसूला जा रहा है जिसकी वजह से उनकी शिक्षा बाधित हो रही है। एक लड़की का तो यहाँ तक कहना है कि उनको मिलने वाली शिक्षा का स्तर ही ठीक नही है। सवाल काफी गम्भीर है, एक शरणार्थी का इस प्रकार से शिक्षा को लेकर कहना कहीं न कहीं सवाल तो खड़ा करता है।

अफगानिस्तान से आये इन शरणार्थियों में से अधिकांश अपने देश का घर-जमीन बेचकर यहां आये हुए हैं। ऐसे में अब उनके आगे यह संकट खड़ा हो गया है कि जाएं तो कहां? भारत के ऊपर पहले से ही जनसंख्या विस्फ़ोट का खतरा मंडरा रहा है ऐसे में दूसरे देश के लोगों को नागरिकता देना चुनौती भरा हुआ साबित हो सकता है। अपने नागरिकों के रोजगार देने के लिए सरकारों के पास कोई ठोस रणनीति नही है, ऐसे में शरणार्थियों को नौकरी देना भी सम्भव नही है। लेकिन 30 वर्ष या उससे अधिक समय से भारत में रह रहे इन अफगानिस्तानी शरणार्थियों को भारत से काफी उम्मीदें हैं। भारत में एनआरसी आने के बाद सरकार का साफ कहना है कि दूसरे देशों से आये लोगों को वापस अपने देश लौटना होगा। जिसमें बड़ी संख्या में बांग्लादेशी, रोहिंग्या मुसलमान और अफगानिस्तानी शरणार्थी शामिल हैं। कोरोना से पहले आए एनआरसी पर कोरोना की वजह से सरकार कोई योजना नही बना पाई लेकिन अब अफगानी शरणार्थियों की बुलंद होती आवाज फिर से इस मुद्दे पर लोगों ला ध्यान खींचने लगी है।