देश में पिछले तीन माह से किसान आंदोलन चल रहा है। इस आंदोलन को लेकर तरह तरह की बाते हो रही हैं। लेकिन इसका असर कितना गम्भीर और परिणाम कितना निराशाजनक है, शायद आप घर में बैठकर या फर्जी पत्रकारों के न्यूज सुनकर इसका आंकलन नही कर सकते हैं। देश को बड़ी पैदावार देने वाले राज्यों के किसानों के आंदोलन का उनके राज्यों में जो प्रभाव पड़ा है उसके गम्भीर परिणाम उत्तराखंड जैसे कम फसली पैदावार वाले राज्य के किसानों से नही लगाया जा सकता है। उत्तराखंड में खेती का अधिक प्रतिशत कुमाऊँ निर्वाहन करता है, ऐसे में गढ़वाल पहाड़ी क्षेत्र के लोगों का किसान आंदोलन को लेकर फोकट का ज्ञान बांटना समझ से परे है। आँख बन्द करके सरकार का समर्थन करने वाले अधिकांश लोगों ने तो खेती का बड़ा स्तर देखा भी नही होगा लेकिन फिर भी किसान आंदोलन को गलत ठहरा देते हैं। गढ़वाल मण्डल में 90% क्षेत्र पर लोग दो या चार खेतों में हल चलाकर खुद को किसान मान बैठे हैं। 10% या इससे कम क्षेत्र ही ऐसा है जहां के लोग अपनी खेती की उपज को बेच पा रहे हैं, और उसको बेचने के लिए भी जिन कठनाइयों से दो चार होना पड़ता है सो अलग। ऐसे में लोगों का किसान आंदोलन पर बिना विश्लेषण के मत रखना सरासर गलत है।

किसान आंदोलन का असर हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के विश्लेषण के बाद ही समझ आता है, जहां टोलटैक्स बन्द पड़ें हैं, खेतों में लोग नही हैं। हाँ आम दिनचर्या के हिसाब से तो कुछ बदला नजर नही आता है लेकिन जिन लोगों ने इन तीन माह में अपने खोये हैं उनकी दुनियां जरूर बदल गई है। ऐसा नही है कि सरकार को इसका नुकसान नही हुआ है या अन्य लोग इससे प्रभावित नही है, लेकिन कई बार आदमी का अहम उसको इतनी ऊपर चढ़ा देता है कि वह बहुत कुछ खोता देख भी सच्च को स्वीकार नही करना चाहता है। तीन माह से बन्द पड़े टोलटैक्स पर काम करने वाले लोगों का रोजगार छिन गया, कोरोडों का टोलटैक्स छूट गया, सैकड़ो किसान मौत के मुह में चले गये लेकिन सत्ता के नशे में चूर वर्तमान सरकार झुकने को तैयार नही।

तेल की कीमतें क्यों बढाई जा रही हैं शायद अब आपको थोड़ा थोडा समझ आ रहा होगा। पुरानी अंग्रेजी हुकुमत और वर्तमान सरकार में सिर्फ इतना फर्क है कि अंग्रेज लगान प्रत्यक्ष लेते थे जो आज आपसे अप्रत्यक्ष रूप से वसूला जा रहा है। किसान आंदोलन से हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई महंगाई से पूरी करने की योजना सरकार ने बनाई और लागू कर दी। अब इस अप्रत्यक्ष लगान को देश का हर नागरिक भर रहा बढ़े किराए भाड़े के साथ । कैसे ? तेल बढ़ा तो किराया भी बढ़ा, तेल बढ़ा तो माल की ढुलाई बढ़ी, माल की ढुलाई बढ़ी तो वस्तु, फल, शब्जी महंगी हो गई, आपने खरीदी तो पैसा सरकार तक पहुंच गया। जबकि यही प्रक्रिया किसान के खेत में उपजे अनाज के लिए ठीक विपरीत हो जाती है, जिसमें किसान का कोई दोष नजर नही आता है। किसान के खेत से 01 रुपये किलो आलू निकला, थोकदार ने खरीदा (क्योंकि कई कुंतल आलू किसान घर घर जाकर बेच नही सकता और ज्यादा देर खेत में छोड़ नही सकता), थोकदार ने एक किलो लिया हुआ आलू 75 से 80 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से तेल भरे ट्रक में डाला और दूसरे राज्य लाया, अब उसने मंडियों को तेल भाड़े के साथ दिया 05 रुपये प्रति किलो, मंडियों ने आड़ेथ लगा कर रेडी वाले को दिया 06 रुपये से 07 रुपये किलो और आपको मिला 10 रुपया प्रति किलो । लेकिन किसान को क्या मिला मात्र 01 रुपया प्रति किलो । क्या यह समझना कोई मुश्किल था, नही । अब किसान जो msp कह रह हैं वह यही है कि जैसे तेल पर केंद्र सरकार सीधे 35 से 49 रुपये प्रति लीटर खा रही है, वैसे ही किसान भी कह रहा है कि फसल का न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित कर दीजिए। अब बताइए कि msp से अर्थव्यवस्था कैसे कमजोर हो सकती है। पैसा देश से बाहर तो नही गया ना?

लेकिन वर्तमान सरकार में सभी नेता बड़े बड़े अर्थशास्त्री हैं। उनको लगता है कि बीन सही से बजाई जाय तो भैंस भी नाच सकती है। और यही हाल रहा और सभी बीन बजाने वालों को सरकार साँप ही समझती रही तो दिन दूर नही जब देश में बीन पर सिर्फ भैंसे ही नाचेंगी। उदाहरण के लिए वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही ले लीजिए। मुद्दे तो शब्जी के साथ मुफ्त में मिलने वाली मिर्च की तरह ही महंगे हो गये हैं। हाँ चुनाव आये तो लोगों को सेना के टैंक, जहाज और युद्धाभ्यास दिखा दीजिए, जीत तो पक्की है। और जो सवाल पूछ ले या विरोध कर दे उसको कोर्ट का नोटिश थमा दीजिए, खाली नही रहेगा तो सवाल पूछेगा कहाँ से। अब उत्तराखंड में 2022 की तैयारियां चल रही हैं, अचानक से दूसरे राज्यों से आने वाले नेता गढ़वाली में भाषण करने लगेंगे भले राज्य के नेताओं के बच्चों को गढ़वाली नही आती हो, ये अलग पहलू है क्योंकि वह देहरादून में रहते हैं। लेकिन भोले पहाड़ी नागरिक वोट उसी को देंगे जो कहेगा "भाइयों और बेणों"। रोजगार कोई मुद्दा नही, किसानों से तो लेना देना ही क्या, महंगाई कोई मुद्दा नही, स्वास्थ्य और शिक्षा से लेना देना क्या।