उत्तराखंड राज्य का गुरु गोरखनाथ का मंदिर तकरीबन 400 वर्ष पुराना है। इस मंदिर में चंद राजाओं के द्वारा चढ़ाया गया घण्टा आज भी मंदिर प्रांगण में मौजूद है। धाम के महंत सोनू नाथ के अनुसार सतयुग में गुरु गोरखनाथ ने यह धुनी जलाई थी। गोरख पंथियों की ओर से स्थापित गुरु गोरखनाथ धाम को गोरक्षक के रूप में भी पूजा जाता है। क्षेत्र की कोई भी उपज हो या दूध, सबसे पहले धाम में चढ़ाया जाता है। मंच में स्थित गुरु गोरखनाथ मंदिर आध्यात्मिक पीठ के रूप में पूरे उत्तर भारत में प्रमुख है। धाम में बड़ी संख्या में निसंतान दंपती पहुंचते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां चढ़ावे और मन्नत से निसंतान दम्पत्ति को संतान की प्राप्ति होती है। उत्तराखंड पूर्व से ही विभिन्न ऋषियों की तपस्थली रहा है, ऐसे में इस बात को नकारा नही जा सकता है कि मंदिर में मौजूद महंतों ने आस्था को लेकर सत्य के तथ्यों को छुपाया हो।

नेपाल सीमा से लगे तल्लादेश क्षेत्र के मंच में स्थित गुरु गोरखनाथ धाम अपनी अनूठी मान्यताओं के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि धाम में सतयुग से अखंड धूनी जलती आ रही है। इसी अखंड धूनी की राख को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। मंदिर की अखंड धूनी में जलाई जाने वाली बांज की लकड़ियां पहले धोई जाती हैं। धाम में नाथ संप्रदाय के साधुओं की आवाजाही रहती है। चंपावत से 40 किमी दूर यह स्थान ऊंची चोटी पर है। यहां पहुंचने के लिए मंच तक वाहन से जाया जा सकता है। उसके बाद दो किमी पैदल चलना पड़ता है। कहा जाता है कि सतयुग में गोरख पंथियों ने नेपाल के रास्ते आकर इस स्थान पर धूनी रमाई थी। हालांकि, धूनी का मूल स्थान पर्वत चोटी से नीचे था, लेकिन बाद में उसे वर्तमान स्थान पर लाया गया। मान्यता है कि यहां सतयुग से धूनी प्रज्ज्वलित है। बाकी विषय आस्था का है, मानो तो पत्थर भी भगवान है और न मानो तो भगवान भी महज मामूली पत्थर ही है।