उत्तराखंड के चमोली जिले में त्रासदी क्यों हुई ये सच जनता तक न पहुंचे इसके लिए तमाम प्रयास शुरू हो चुके हैं। सेना के ऊपर लोगों को मलवे से निकालने का दबाव है तो स्थानीय लोगों पर अपनों को ढूंढ निकालने का लेकिन इस सब के बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके ऊपर घटना स्थल से अपनी तस्वीरों को खींच कर जनता के बीच में लाने का दबाव है। अभी तक आपने सुना होगा की फलाना विधायक या फला फला पार्टी का कार्यकर्ता या आधे कच्छे वाले स्वयं सेवक इतने घण्टों से डटे हुए हैं। इतनी ठंड में अगर आप पूरे कपड़े पहन कर नही जा रहे या किसी पार्टी विशेष का प्रतीक लेकर त्रासदी स्थल पर जा रहे हो तो मतलब साफ है कि आप बचाव कार्य की नियत से कम और प्रचार की भावना से ज्यादा गये हो। क्या यह समय इस प्रकार से खुद को प्रदर्शित करने के अनुकूल था ? पहाड़ समीक्षा की नजर में बिल्कुल नहीं ! आप केवल और केवल राजनीतिक फायदे की नियत से वहां गये । आपने जवानों द्वारा चलाई जा रहे राहत कार्य को ही बाधित नही किया बल्कि तमाम उन लोगों के साथ छलावा किया जिनके अपने इस त्रासदी में कहीं गुम हो गये।

देश में जवानों के अंदर इतना जज्बा है कि अगर कोई नेता घटना स्थल तक न भी पहुंचे तो वह अपने नागरिकों के लिए जान की बाजी लगा देते हैं। तो फिर इस ठंड में स्वयं सेवक आधा कच्छा पहन के वहां कैसे पहुंच गए। और अगर सच में स्वयं सेवक का प्रशिक्षण उस स्तर का है जितना की सेना तो आपदा के सभी कार्यों में पूरे देश में स्वयं सेवक ही भेजे जाएं। अब तक चमोली और रुद्रप्रयाग के जंगल आग में जलते रहे उस वक्त कहाँ थे आधे कच्छे वाले लोग। क्या स्वयं सेवकों को यह नही सिखाया गया -" जीवो- जीवे रक्षते" हजारों बेजुवान आग में जल गये उस वक्त तो कोई स्वयं सेवक पानी की जैरकीन कांधे में लिए नजर नही आया। फिर आज कैसे इतनी ठंड और जंगली भालुओं (जैसा की प्रचार किया जा रहा है) के बीच में आधे कच्छे के साथ कूद पड़े। इंसानियत के नाते खुद से सवाल पूछिए, क्योंकि मरने वाला भी इंसान है और बचाने वाला भी इंसान। पहले इंसान बनिए उसके बाद नेता या स्वयं सेवक।