मैदानी क्षेत्रों में जहां बसंत पंचमी को सरस्वती पूजन के रूप में मनाया जाता वहीं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बसंत पंचमी की एक अलग ही झलक देखने को मिलती थी/है। उत्तराखंड के गढ़वाल मण्डल में बसंत पंचमी कई लिहाज से खास मानी जाती है। बसंत पंचमी को लेकर लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी का एक गीत भी राज्य में ख्यातिप्राप्त है। जिसके बोल कुछ इस प्रकार से हैं - "आई पंचमी मौ की, माटी हरियाली जौ की" जैसा की इन सुरवाती लाइनों से ही साफ है कि जौ इसी माह में उगने वाली फसल है। जब पहाड़ों पर खेती थी और पलायन नही हुआ था तो मौ माह में खेत जौ से हरे भरे होते थे। इस पर्व को पहाड़ी क्षेत्र में धन-धान्य का पर्व माना जाता है, इसलिए इस दिन घर को हराभरा दर्शाने के लिए जौ के छोटे पौधों को अपने दरवाजों पर गाय के गोबर के साथ लगाया जाता था और खेतों की सम्पन्नता के लिए ओडू ( एक लम्बे खेत की बांट की सीमा) पूजा की जाती थी। आज शहरों में आ चुकी नई पीढ़ी इस बसंत पंचमी का महत्व नही जानती है। उनके लिए सिर्फ सरस्वती पूजन ही बसंत पंचमी का भाव रह गया है। देखा जाय तो बसंत पँचमी का सम्बन्ध बंसन्त के आने से ही है। बंसन्त पँचमी के बाद पहाड़ों पर चीड़ के पेड़ो से पीले रंग की फुवाद बहने लगती है जो की होली के आगमन का संकेत होता है।

नव विवाहित बेटियों के लिए बसंत पंचमी का अलग ही उलार होता था। लोकगयक नेगी ने अपने गीत में इसका जिक्र कुछ इस प्रकार किया है- "मैत वाली मैत होली, नीरमैत्या होली रोणि यकूली" अर्थ साफ है कि जिस लड़की के माँ-बाप और भाई होंगे वो तो अपने मायके में होगी और जिसका कोई नही होगा अर्थात अनाथ होगी वह ससुराल में उदास हो रही होगी। आज की पीढ़ी भावनाओ के इस दर्द को शायद महसूस भी नही कर सकती है। वर्षों एक घर में रहने के बाद जब बेटी ससुराल जाती थी तो वापसी के लिए बेटी ऐसे ही त्यौहारों के सहारे रहा करती थी। आज फोन जैसे उपकरण ने जहां त्वरित संचार दिया लेकिन सम्वेदनाएँ खत्म कर दी।

बच्चों के लिए बसंत पंचमी मीठी खीर खाने के उलार से शुरू होती थी। खेत (पुंगड़ा, डोखरा) का ओडा (अपने खेत की सीमा) पूजने के बाद खेत में खीर चखने का मझा, आह! 'आज रे गेनी बस टपकारा'। इन सब संवेदनाओं का खोले का जो दुःख है वह शहर के सुखों से नही बाँटा जा सकता है। इसलिए पहाड़ समीक्षा लगातार कहता है कि पहाड़ी क्षेत्र में सुविधाओं का विश्लेषण और वर्गीकरण हो, आने वाली पीढियां पहाड़ की महान संस्कृति से वंचित न हो जाएं इसका प्राथमिकता से ध्यान रखा जाए। आज जो दर्द मुझे इस लेख को लिखते हुए हो रहा है कल किसी और को न हो या कल कोई हमसे ये सवाल न पूछे कि तुमने इतने महान सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए क्या किया। तब क्या कहेंगे, कि हमने जगह जगह बांध बनाये, सड़कें खोद खोद का भूमि का क्षरण किया या सुविधाओं के अभवा की डर से पलायन कर दिया, क्या कहेंगे ? एक बार खुद से पूछिए।