उत्तराखंड में पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के नाम पर बुने जा रहे मौत के अड्डे सिर्फ कहने भर का विकास है। पहाड़ टीवी में एक इंटरव्यू में वाडिया संस्थान का एक वैज्ञानिक जिस प्रकार से विकास के तथ्यों की बात कर रहा था, वह सरासर निराधार हैं। उनका कहना था कि पहाड़ी क्षेत्र के विकास के लिए ऊर्जा प्राथमिक स्रोत है लेकिन वह यह भूल गये शायद कि पहाड़ों को ऊर्जा देने के लिए एक बांध ही काफी है। पहाड़ों पर ऊर्जा के लिए बांधों से अधिक सोलर प्लांट कारगर सिद्ध होते अगर सरकार सच में पहाड़ी क्षेत्रों का विकास चाहती। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि बाँध सिर्फ पहाड़ों पर ही क्यों बने ? ऋषिकेश में बनाओ, हरिद्वार में बनाओ और तमाम उन स्थानों पर बनाओ जहां पहाड़ी क्षेत्र (कुमाऊँ और गढ़वाल) से बहने वाली नदियां जाती हैं। एक तरफ बात करते हैं हिमालयन क्षेत्र संरक्षण की तो दूसरी तरफ भारी भारी मशीनों से सुरंगे बना के हिमालय क्षेत्र में कम्पन कर विकट स्थितियां पैदा करते हो।

अकेले उत्तराखंड राज्य में 24 से अधिक छोटे बड़े बांध कार्यरत हैं। कितने उत्तराखंडी युवाओं को इनमें रोजगार दिया गया है सरकार आँकड़े समाने रखे और फिर बात करे पहाड़ी क्षेत्र का विकास हुआ या नही। वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक ने जिस सादगी से पलायन को बांध परियोजना से जोड़ा उससे साफ है कि दिशाहीन लोग पहाड़ों पर पलायन रोको की योजनाएं बना रहे हैं। बांधों के सर्वे होते ही जनता विरोध करती है तो पैसों से सरकार उनका मुह बन्द कर देती है। भारी विरोध के बाद भी हर जगह बांध बनाये जा रहे हैं। ऐसे में इस प्रकार की घटनाओं का स्वाभाविक है। वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक का यह कहना कि इस प्रकार की घटनाएं पहले भी होती थी लेकिन तब वहां आवादी नही थी इसलिए त्रासदी नही होती थी, का पहाड़ समीक्षा खण्डन करता है। एक तरफ तो आप कहते हैं कि पलायन रोकने के लिए बांधो का बनाना जरूरी है और दूसरी तरफ कहते हैं कि पहले आवादी थी ही नही । तो जब आवादी थी ही नही तो पलायन हुआ कहाँ से और बांध रोकने के लिए बना रहे हो या बची हुई आवादी को बहाने के लिए, पूछता है पहाड़ समीक्षा।

पुरानी टिहरी जैसे ऐतिहासिक शहर को बर्वाद करके उत्तराखंड को कितनी बिजली मुफ्त मिली ? और अगर सरकार में बैठे गिद्दों को पैसा ही कमाना था तो पुरानी टिहरी को पर्यटक स्थल बना के इतना कमाया जा सकता था कि पहाड़ी क्षेत्र का विकास किया जा सके। क्यों नही किया ? स्वर्गीय गोविंद पंत क्यों अगल राज्य के विरोध में थे क्या इसका विश्लेषण नही कर पाए राजनेता, या फिर इतनी काबिलियत बची ही नही। बेरोजगारी का आंकड़ा देख के भी तुम्हें अगर उनकी कही बातें याद नही आती तो यह इस राज्य का दुर्भग्य है। दुःख तो इस बात है कि आज देहरादून में बैठे बड़े बड़े नेता कभी इन्ही पहाड़ी क्षेत्रों में पले बढ़े होने ले बाबजूद भी विकास का सही वर्गीकरण नही कर पाए। दूसरे राज्य खुद के फायदे के लिए पहाड़ी क्षेत्रों को जैसा बर्वाद करते रहे हमारे नेता उनका साथ देते रहे और अब भी न सुधरे तो स्थिति इससे कई गुना विकट होगी।

अब चमोली आपदा से पहाड़ की अनदेखी का एक पहलू और उभर कर सामने आ गया। रैणी गांव के लोगों के विरोध को दरकिनार कर नीती घाटी में कुछ दूरी पर एक नहीं बल्कि तीन जल विद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। यह अभी साफ नहीं है कि इन तीनों जल विद्युत परियोजनाओं के पर्यावरण पर संचयी प्रभाव का अध्ययन किया भी गया या नहीं। किसी भी जल विद्युत परियोजना के लिए पर्यावरण अध्ययन रिपोर्ट जरूरी मानी जाती है। 2006 की अधिसूचना के मुताबिक जन सुनवाई इस रिपोर्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें बांध से प्रभावित लोगों की राय शामिल की जाती है। प्रदेश में टिहरी बांध, पंचेश्वर बांध और अन्य बांधों को लेकर होने वाली जन सुनवाई मुआवजे पर ही केंद्रित होकर रह जाती है।

लोगों को आर्थिक नुकसान का जिक्र इसमें हो जाता है, लेकिन उनके सामाजिक और सांस्कृतिक ताने बाने पर बात आगे नहीं बढ़ पाती। यह अनदेखी लगातार जारी है और अब पर्यावरण अध्ययन रिपोर्ट के नए ड्राफ्ट के नोटिफिकेशन में जन सुनवाई से ही किनारा कर लिया गया है। एक दूसरा पहलू परियोजनाओं के संचयी प्रभाव का है। यह अब स्वीकार किया जा रहा है कि कम अंतराल पर बनने वाली परियोजनाओं का पर्यावरण पर अलग तरह का प्रभाव पड़ता है। यह अभी साफ नहीं है कि ऋषिगंगा, एनटीपीसी और तपोवन विष्णुगाड़ परियोजनाओं के संचयी प्रभाव का अध्ययन किया भी गया या नहीं। चमोली में रविवार को आई आपदा से दो परियोजनाएं ध्वस्त हो गईं और विष्णुगाड़ परियोजना का विद्युत उत्पादन प्रभावित हुआ।