उत्तराखंड राज्य गठन तक राज्य का अधिकांश भूभाग जंगल से घिरा हुआ था। राजधानी देहरादून में भी बहुत से ऐसे स्थान थे जहां कभी जाने में डर लगता था। इनमें से कुछ स्थानों जैसे भानियावाला और बंजारावाला आदि स्थानों पर टिहरी विस्थापितों को बसाया गया। अगर राज्य के वन मानक पर एक नजर डालें तो अभी भी स्थिति ठीक ही नजर आती है। क्योंकि राज्यों की तय नियमावली के अनुसार राज्य में 33% भूभाग पर वृक्षों का होना अनिवार्य है लेकिन आज कुछ राज्य इस स्थिति में नही है। इनमें एक नाम पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश का भी है। लेकिन बात अगर उत्तराखंड की करें तो 2017 के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 45% भूभाग पर जंगल हैं जो कि पर्यावरण की दृष्टि से राज्य के लिए अच्छी खबर है। आज उत्तराखंड की सरकार को पर्यावरण पर ध्यान केंद्रित करने की बेहद जरूरत है। ऐसे इसीलिए भी जरूरी हो गया क्योंकि आप सड़क निर्माण के चलते हजारों वृक्ष नही काट सकते हैं। वृक्ष लगाने की दर से ज्यादा कटान दर के चलते राज्य में मौसमी बारिश पर बेहद प्रभाव पड़ा है।

प्रदेश में लगभग 70% से अधिक पहाड़ी भूभाग पर जंगल है ऐसे में पहाड़ी जंगलों का संरक्षण कितना महत्वपूर्ण हो जाता है, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। पिछले 10 वर्षों में जो कार्य बेहद आसानी से किया जा सकता था, सरकार ने ठीक उसके विपरीत कार्य किया और पहाड़ी क्षेत्र हर प्रकार से इसकी मार झेल रहा है। पलायन के चलते जंगलों की कटाई पर काफी हद तक रोक पिछले 10 वर्षो में लगी है। इसके बाबजूद भी बहुत से जंगल समाप्ति की कगार पर आ गये हैं, वजह ? वन विभाग का गैर जिम्मेदारा रवैया। आपको यह जानकर शायद हैरानी होगी कि किसी पहाड़ी क्षेत्र में जाने वाली सड़क से महज 04 से 05 वृक्ष कटान में आते हैं और जंगलात वर्षों तक गाँव को सड़क से वंचित रखता है। लेकिन राज्य में आलवेदर के नाम पर हजारों वृक्ष काट दिए गये, पूछने वाला कोई नही ।

राज्य में कुछ बुद्धिजीवीयों का मानना है कि राज्य में बन रहे बांधो से पहाड़ी क्षेत्र में दुष्प्रभाव नही बढ़े हैं। शायद इन में बहुत से लोग या तो राजनीतिक पार्टियों के समर्थक होंगे या फिर उनका शैक्षणिक स्तर उस स्तर का नही है कि वह बांधो का विस्तृत विश्लेषण कर सकें। लेकिन ऐसा भी नही है कि बांध बनने से केवल नुकासन ही नुकासन है। लेकिन दुर्भग्यवश उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र को बांधो के फायदे मिले नही हैं। किसी भी पहाड़ी जिले में बांध के बनने से जिले के युवाओं को शिक्षा के आधार पर नौकरी में प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी जो नही मिली, दूसरा जिले में बिजली न्यूनतम मूल्य पर या मुफ्त में दी जानी चाहिए थी, जो सरकार ने नही दी। बस बांध के यही दो बड़े फायदे पहाड़ी क्षेत्र में नजर आते हैं लेकिन बांध के दुष्प्रभाव इससे कई ज्यादा हैं। किसी भी पहाड़ी क्षेत्र में बांध का पहला और सबसे बड़ा दुष्प्रभाव है पर्यावरण की क्षति, एक बांध को बनाने के लिए सैकड़ो वनस्पतियों को प्रभावित होना पड़ता है। अधिकांश तो कटान में आ जाती है और बाकी बांध कार्य के चलते धूल धक्कड़ से नष्ट हो जाती है। बांध का दूसरा बड़ा दुष्प्रभाव है कि समाजिक और सांस्कृतिक ताने बाने को प्रभावित करता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है टिहरी बांध। बांध का तीसरा बड़ा दुष्प्रभाव है नदियों के बहाव को प्रभावित कर उनमें प्रदूषण का स्तर बढाना, इसका राज्य में सबसे बड़ा उदाहरण है चौरास-श्रीनगर बांध । इस बांध के बनने के बाद अलकनंदा के जल पर शोध किया गया तो पाया गया कि श्रीनगर के समीप अलकनन्दा का जल जानवरों के पीने योग्य भी नही बचा है, कारण जल में स्थिरता का होना। बांधो का पहाड़ी क्षेत्र में चौथा और सबसे बड़ा दुष्प्रभाव है कि यह eveporation (वाष्पीकरण) प्रक्रिया को इतना प्रभावित करता है कि क्षेत्र में होने वाली वर्षा असंगत हो जाती है, अर्थात यह पूरे क्षेत्र को वर्षा के लिहाज से दो प्रकार से प्रभावित कर रहा है। जहां झील है वहां सर्वाधिक वाष्पीकरण होता है और इस वाष्प से बनने वाले बादल हवा के साथ क्षेत्र से बाहर चले जाते हैं, दूसरा नदियों के जल से जितना वाष्पीकरण होना चाहिए था वह नही होता इसलिए क्षेत्र बेमौसम बरसात का शिकार हो जाता है।

आपने हर साल हरेला पर्व (जुलाई माह) में सुना होगा कि सरकार ने इतने लाख वृक्ष लगाए। लेकिन आपने कभी सुना कि पिछले साल लगाए गये वृक्षों में से इतने वृक्ष बड़े हो गये हैं। राज्य में वृक्ष युक्त भूमि के प्रतिशत पर नजर डाले तो उसमें लाखों वृक्ष लगने के बाद जो सुधार होना चाहिए था वह कहीं देखने को नही मिलता है। क्यों ? ऐसा कोई सवाल न बचे इसके लिए वन विभाग पूरी तैयारी के साथ योजना बनाता है। एक तो वर्षा न होना सीधे विभाग के हक में चला जाता है। जबकि सरकार से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि बांधों का जल दूसरे राज्य को भेजा जा रहा है तो वही जल करोड़ रुपये खर्च कर लगाए गये लाखों वृक्षों को क्यों नही दिया जाता ? दूसरा मौके पर कुछ भी अंश न दिखे इसके लिए वन विभाग खुद ही जंगलों को आग में झोंक देता है या किसी के द्वारा लगाई गई आग पर उचित कारवाई नही करता है और न ही समय रहते आग पर काबू पा सकता है। बारकी से जब सभी बातों का विश्लेषण करें तो नजर आता है कि सरकारी विभागों के उच्च पदों पर बैठे कर्मचारी भी राजनीति से ग्रसित हैं। जिस नियत से आज पहाड़ों के विकास की बात कही जा रही है, पहाड़ समीक्षा दावे के साथ कहता है कि आने वाली पीढियां इस नियत में केवल खामियां ही खामियां निकालेंगी। सुविधाओं का वर्गीकरण अगर नही किया गया और ऐसे ही बेवजह केप्रोजेक्टों को पैसों के लाभ के लिए पहाड़ी क्षेत्र पर थोपा गया तो स्थिति और नीचे गिरेगी लेकिन सुधरेगी नही। इन सब में सबसे ज्यादा नुकसान होगा पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों का। इसलिए समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को पहाड़ी क्षेत्र के संरक्षण के लिए आगे आने की जरूरत है।