उत्तराखंड में हिमालय क्षेत्र में बढ़ रही गतिविधियों से अगर किसी को सर्वाधिक नुकसान हुआ है, तो वह है निकटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग। पहाड़ समीक्षा ने श्रीकोट मेडिकल कॉलेज में कार्यरत चमोली गढ़वाल के एक प्रवक्ता से चमोली जिले में हो रही जलवायु परिवर्तन पर काफी विस्तृत वार्ता की तो पता चला कि चमोली गढ़वाल में उगने वाले तमाम फलों और फसलों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। ग्लोबल वार्मिंग से भी हिमालय क्षेत्र प्रभावित है। राज्य में भूगर्भीक जैसे संस्थानों की भूमिका पर प्रवक्ता ने चिंता जाहिर की। जोशीमठ और आस पास के इलाकों से धीरे धीरे काफी फल उत्पादन गिरा है। कीनू, संतरा जैसे फल भी अब निचले भूभाग से खत्म होने लगे हैं।

आज जो ग्लेशियर फटने से नुकसान हुआ उसमें बाँध की के टूटने से नदियों का जल स्तर बढ़ा न की केवल ग्लेशियर के टूटने से। पहाड़ी क्षेत्रों में काम करने वाली कम्पनियां मानकों को ताक पर रखकर कार्य करती रहीं है कभी भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नजर नही आते हैं। हाँ, जब कोई हादसा हो जाता है उसके बाद सभी सरकारी विभाग और सरकार कुछ समय के लिए हरकत में जरूर आ जाते हैं। इस घटना में सबसे बड़ा सवाल जो उठकर आ रहा है वह यह है कि आखिर इस ग्लेशियर के बारे में पूर्व से कोई सूचना क्यों नही थी। हाल ही में नेपाल ने पिथौरागढ़ की महाकाली नदी पर बनने वाले ग्लेशियर की रिपोर्ट जारी की थी उसके बाद भी राज्य के अन्य ग्लेशियरों के बारे में कोई जानकारी नही जुटाई गई।

उत्तराखंड में बनने वाले बांधों से उत्तराखंड राज्य नागरिकों को क्या फायदा हुआ। न बिजली ही उचित दामों पर मिली और न राज्य के युवाओं को रोजगार ही मिला। किसी हादसे के बाद नेताओं का यह कह देना कि हम उत्तराखंड के साथ हैं, इससे पहाड़ी नागरिक को होने वाले कष्ट कम नही हो जाएंगे। पर्यावरण को पहुंचाया गया नुकसान कम नही हो जाएगा और नदियों को जल स्तर में गिरावट के होने वाला प्रदूषण भी कम नही हो जाएगा। राज्य में पहाड़ी नागरिकों की सहनशीलता शहरी नागरिकों से ज्यादा है इसका मतलब ये बिल्कुल नही है कि विकास के नाम पर विनाश करते रहो। उत्तराखंड में बने बांधों को वजह से नदियों को नुकसान पहुंचाया गया है। आने वाले समय में नदियों पर भी अतिक्रमण हो जाएगा और फिर शुरू होगा असली खेल।