भारत में कोरोड़ो लोगों ने स्वास्थ्य बीमा किए हुए हैं लोगों को लगता है कि बीमा हो गया यो मतलब बेमौत मरने से तो बच ही जाएंगे। लेकिन सच ठीक इसके विपरीत है, कोरोना काल में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को देखकर लोग समझ ही गये होंगे। करोडों की कमाई करने वाली कम्पनियों को दरअसल लोगों से कोई मतलब है ही नही, आपसे लिया पैसा कम्पनी शेयर मार्केट में लगाकर अरबों कमा रही है लेकिन जिस हस्पतालों को पैनल में आपको देती है उनकी व्यवस्था पर एक कौड़ी भी खर्च नही करती है। आप इन बीमा कम्पनियों को पैसा किस लिए देते हैं ताकि मुश्किल व्यक्त में आसानी से सुविधाएं मिल सकें लेकिन इस बार के मुश्किल समय ने इन बीमा कम्पनियों की पोल खोल दी है। साधारण दिनों में तो वैसे भी प्रायः सरकारी हस्पतालों में ही सुविधाएं मिल जाती है फिर बीमा जैसी जमाखोरी का क्या फायदा । इन्ही बीमा कम्पनियों और बीमा देने वाले लोगों की वजह से आईसीयू, विण्टेलेटर और ऑपरेशन का खर्चा इतना बढ़ गया कि आम नागरिक अपना इलाज करवाने में भी कतराता है, क्योंकि जिस इलाज ने महज 5000 में होना था उसके लिए बीमा कम्पनी 50,000 निजी हस्पतालों को देती है और ऐसा इसलिए करती है क्योंकि उसको पता है लाखों में से महज सैकड़ो ही लोग तो इस अवस्था तक पहुंचेंगे। लेकिन लोग इस बात को नही समझते हैं क्योंकि सहनशीलता नामक शब्द उनके जीवन से नदारत है जिसकी वजह से वह अपने लाखों रुपये इस बीमा कम्पनियों को देकर उनको अरबोंपति बना रहें हैं और देश व स्वयं को बर्बादी के मुह में खकेलते जा रहें हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत का हर व्यक्ति पहले से ही सरकार को मिटा टैक्स दे रहा है। क्योंकि भारत में हर वस्तु पर टैक्स पहले से ही वसूला जा रहा है और बीते कुछ सालों में तो यह टैक्स बेतहासा बढ़ भी गया है। इसके अलावा विकासशील देशों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर विकसित देश उनकी दशा सुधारने के लिए भी करोड़ों रुपये खर्च करते हैं। यह पैसा विकसित देशों के लोग अपने वेतन से सरकारों को देते हैं जिसको सरकारें आर्थिक मदद के रूप में विकासशील देशों को निर्वहन करती हैं। भारत एक मात्र देश है जो अपनी जनता से सबसे अधिक टैक्स वसूली करता है। उदाहरण के लिए यदि आप सरकारी कर्मचारी हैं तो आपके वेतन से इनकम टैक्स लिया जाता है, स्वास्थ्य सेवा के लिए अलग से कटौती की जाती है, इसके अलावा आप जो भी वस्तु खरीदतें है उन सब पर वस्तु कर ( टैक्स) का भुगतान करते हैं। बदले में आपको सरकार क्या देती कुछ नही पहले फिर भी सरकार आपको पेंशन देती अब तो वो भी सरकार ने देनी बन्द कर दी है। मझेदार बात क्या है, आपके वेतन से स्वास्थ्य के लिए कटने वाले पैसे के बाबजूद आपको दवाईयां पुनः टैक्स देकर खरीदनी पड़ती हैं क्योंकि हस्पताल कह देते हैं ये दवाईयां हमारे पास नही हैं।

भारत में बुद्धिजीवी डॉक्टर सरकार से कह रहें है की "यूनिवर्सल हेल्थ पालिसी" को भारत में लागू करों लेकिन नेता जानते हैं इससे जमाखोरी नही होगी और अगर जमाखोरी नही होगी तो पार्टियों को चंदा कहां से मिलेगा। आस्ट्रेलिया जैसे देश इसी पालिसी से अपने नागिरकों को निःशुल्क इलाज दे रहें क्योंकि टैक्स से जुटाया पैसा वहां की सरकार अपने नागरिकों पर ही खर्च कर देती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि सभी नागरिकों को एक समान इलाज प्राप्त होता है। भारत की तरह गरीबों के साथ भेदभाव वाला इलाज नही मिलता है। भारत में एक मूर्ख तबका ऐसा भी है जिसकों लगता है कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाला का देश की अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नही है, तो ऐसा बिल्कुल नही है। क्योंकि किसी भी वस्तु की खरीद पर उसने भी उतना ही टैक्स चुकाया है जितना कि एक मध्यमवर्गीय या उससे ऊपर के व्यक्ति ने। भारत के जिम्मेदार नागरिक जब अपनी जिम्मेदारी बीमा कम्पनियों को देकर यह सुनिश्चित कर रहा है कि उसको सही इलाज मिलेगा जबकि बीमा कम्पनी को हस्पताल व्यवस्था से कोई लेनादेना नही है तो आप सोच सकतें हैं देश किस दिशा में बढ़ रहा है।