भारत में इस समय की स्थिति किसी से छुपी नही है। पिछले 70 वर्षों के कार्यालय को गिना के सत्ता में बैठे मोदी कितने बड़े हवाबाज हैं ये विदेशी मीडिया भी खूब छाप रहा है। देश का मीडिया तो बिक चुका है इसलिए न सच पढ़ने में आता है और न ही दिखने में लेकिन विदेशों में पत्रकारिता का बची स्वतंत्रता की वजह से अभी भी वहां का मीडिया सच छाप रहा है। देखा जाए तो भारत में अब तक हुए प्रधानमंत्रियों में मोदी सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं, क्योंकि जो व्यक्ति अपनी आलोचना नही झेल सकता उससे बड़ा कमजोर कोई नही हो सकता है। मोदी ने पिछले कुछ समय से यही काम किया जिसकी वजह से उनकी बढ़ती लोकप्रियता पर बहुत बड़ा दाग लग गया है और लोग समझने लगे हैं कि मोदी का व्यक्तित्व उतना साफ नही है जितना वो दिखाने की कोशिश करते हैं। आखिर एक प्रधानमंत्री इतना कमजोर कैसे हो सकता है कि उसको ट्विटर से ट्वीट हटाने पड़े, सच लिखने पर मीडिया को धमकाए, सच को दिखाने पर प्रोटोकॉल का हवाला दे और अब हद तो ये हो गई की विदेशी मीडिया को भी सच दिखने पर धमकाने की कोशिश हो रही है।



सत्य हिंदी नामक चैनल ने एक कार्यक्रम में बताया कि मोदी और उनसे जुड़े लोग कैसे विदेश में छपने वाली खबरों पर भी अंकुश लगाने की कोशिश कर रहे हैं। आस्ट्रेलिया के अखवार के अहंकारी लिखले पर कैसे अखबार सम्पादक को खबर निराधार बताई जा रही है। बंगाल चुनाव के लिए बिहार से भीड़ जुटाना और उसके बाद उसका लाइव प्रशारण करके कहना कि मैंने इतनी जनता आज तक चुनावी रैली में नही देखी, कहने के बाद भी सच लिखने वालों की खबरों को निराधार बताया जा रहा है। मुक्त रूप से कार्य करने वाले चुनाव आयोग को भी इशारों पर काम करना पड़ रहा है ऐसे में में सच अब निराधार ही लगता है।



भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री कह रहें है कि ऑक्सिजन की कमी नही है और उनके बायान के 24 घण्टे के भीतर ही 249 कोरोना लोग ऑक्सिजन की कमी या बिना उपचार के दम तोड़ देते हैं लेकिन बिकाऊ मीडिया खामोश है। खुद प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस में कोरोना से हाहाकार है लेकिन मजाल है कि भारतीय मीडिया बनारस को लेकर कुछ लिख दे या छाप दे । जीते जी तो छोड़ो बनारस में तो मरने के बाद भी 30 से 40 हजार रुपये में अंतिम संस्कार हो रहा है। एक मुहावरा सुना पढा था 'अंधेर नगरी चौपट राजा' आज उसका मतलब समझ आया है।



विदेश नीति की सफलता की बात करने वाले प्रधानमंत्री को आपातकाल में भी दूसरे देशों से मदद मांगने पर मदद नही मिल रही, तो कैसी विदेश नीति । पैसा खर्च करने पर तो तबायफ भी नाचती है और आपने भारत की जनता का करोड़ो रुपया विदेशों में भीड़ जुटाने में खराब कर दिया सिर्फ इस लिए कि तुम्हें मोदी मोदी सुनना पसन्द हैं। जब जरूरत का वक्त आया तो दवाई बनाने के लिए आवश्यक कच्चे माल के लिए अमेरिका आपको मुह पे ही ना कर देता है। उसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार फिर से मिन्नतें करता है और फिर पता नही किन शर्तों पर अमेरिका मान जाता है। क्या यही सब होता है विदेश नीति में ? जनता का करोड़ो खर्च कर एक आदमी विदेश दौरे करता है और जब उसी जनता को मदद की जरूरत है तो दूसरा देश मदद से इनकार कर देता है।


पिछले सात सालों में महंगाई अपने चरम पर है। सरकार ने जितना पैसा अपनी ऐसा आराम में खर्च किया उतना अगर वस्तु दरों को सही मूल्य रखने पर निर्वहन करती तो शायद आज देश में पेट्रोल- डीजल सस्ता होता, खाद्य पदार्थ सस्ते होते, यातायात किराया भाड़ा सस्ता होता, गैस-तेल सस्ता होता लेकिन नही जनता से टैक्स वसूली करों और भाजपा के कार्यालय बनाओ, चुनावी रैलियां करो, केयर फंड अम्बानी-अडानी पे लुटाओ, आपने लिए जहाज बनाओ और जनता से कहो हम तो फकीर हैं। अगर फकीर ऐसे होते हैं तो देश का हर नागरिक फकीर बनना चाहेगा।



समय पर चुनाव में मस्त रहने की ऐसी कीमत भारत में कभी नही चुकाई। ये इतिहास में पहली बार हुआ है कि देश का प्रधानमंत्री जनहानि के संकट में भी रैलियों में मस्त रहा। जनता को मन की बात कार्यक्रम पर करोड़ो खर्च करके दो गज का पाठ पढ़ाने वाला चुनावी रैलियों में बिहार से भीड़ जुटाता रहा है और खचाखच (जिनमे दो इंच का भी फासला नही था) ऐसी रैलियों में भाषण करता रहा। आनजाब विदेशों में भारत की थू-थू, न ऑक्सिजन है और दवाईयां । दुनियां का सबसे बड़ा लोकतंत्र कैसे मजाक बनकर रह गया इस पर विदेशी मीडिया चुटकियां ले रहा है।