आज देश की जो स्थिति है उसकी जिम्मेदारी किसकी है ? सब जानते है लेकिन सवाल पूछने का दम किसी में नही । जिस देश का चुनाव आयोग ही भ्रष्ट हो गया हो वहाँलोग अभी भी लोकतांत्रिक मूल्यों के जिंदा रहने की उम्मीद लगाए हुए हैं, हैरानी की बात है। देश में अगर सेना कुछ अच्छा करे या वैज्ञानिक कुछ अच्छा करे तो भारतीय मीडिया बस एक ही व्यक्ति के गुणगान गाता है, जो कि अच्छी बात भी है। लेकिन जब कुछ गलत होता है तो मीडिया उसी चेहरे को छुपाने की कोशिश करता है, क्यों भाई ? उसी चेहरे के संसदीय क्षेत्र में एक शव को जलाने के 20 से 30 हजार रुपये वसूले जा रहे हैं तो ठीक, उसी व्यक्ति के संसदीय क्षेत्र में पीने का स्वच्छ पानी नही मिल रहा तो ठीक, कोरोना काल में उसी व्यक्ति के संसदीय क्षेत्र में लोगों को हस्पताल और ऑक्सिजन नही मिल रहा तो ठीक और मीडिया इतना शातिर की उस क्षेत्र की कोई कवरेज सार्वजनिक नही कर रहा, कमाल है । जी हाँ, माँ गंगा के बेटे के बेटे और बनारस की बात हो रही है। बनारस के लोग पूछ रहे हैं कहाँ है माँ गंगा का वो बेटा ? 

दो दिन पहले देश के प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि हम लॉक डाउन के हक में नही हैं और राज्यों से अपील है कि वे प्रवासी लोगों में भरोसा जताएं । लेकिन एक भी मीडिया कर्मी में इतना दम नही हुआ कि आपकी रैली में जो ट्रक और ट्रेक्टर भर भर के बिहार से लोग बंगाल लाए गये थे उनको वापस भेज दिया की नही ? इसकी क्या सम्भवना है कि जो लोग बिहार से बंगाल ले जाए गये उनकी कोरोना रिपोर्ट नकारात्मक थी। इसीलिए ऊपर चुनाव आयोग को भ्रष्ट लिखा क्योंकि सब कुछ पता होने के बाद भी अगर चुनाव आयोग चुप है तो ऐसे आयोग की भारत को जरूरत ही क्या है। एक रैली पे करोड़ों रुपये खर्च किया जा रहा है, विधायक करोड़ो में खरीदें और बेचे जा रहे हैं और क्षेत्र में साल भर में 10 लाख के भी कार्य नही हो पा रहे तो ऐसे आयोगों की इस स्थिति में कोई भूमिका नजर नही आती है। 

गुलाम क्या होते हैं कभी देखे तो नही बस इतिहास में पढ़े थे, लेकिन वर्तमान सरकार में चल रहे मीडिया संस्थान और चुनाव आयोग जैसे संस्थानों को देखकर कुछ कुछ चरित्रार्थ होने लगा है। भारत का सबसे मजबूत पिलर लोकतंत्र बुरी तरह प्रभावित है लेकिन संवेदनहीन सरकार चुनावी रैलियों में ज्यादा व्यस्त नजर आती है। देश में कुछ लोग राम राज की बात कर रहें लेकिन कार्य ठीक विपरीत हो रहे हैं। और जवाबदेही जिनकी है उनको केवल चुनाव जितना ही सबसे अनिवार्य कार्य नजर आता है। मझेदार बात तो यह है कि जिन आयोगों/अदालतों की सरकार पर पकड़ होनी चाहिए थी वो भी सरकार के पक्ष में झुकी नजर आती हैं। विपक्ष की तो बात ही क्या करें क्योंकि जनता को विपक्ष की भूमिका का महत्व ही समझ नही आता तो लोकतंत्र जिंदा रहे भी तो कैसे; लोकतंत्र का सही मतलब जो है वह वास्तविक रूप में यही है कि वोट भले सत्ता पक्ष को करो लेकिन खड़े विपक्ष के साथ रहो और अगर ऐसा नही करोगे तो दुर्गति सुनिश्चित है।