हस्पतालों की दुर्दशा vs 3000 करोड़ की मूर्ति


राजनीति में बैठे लोगों का विवेक सिर्फ सत्ता तक ही सीमित रहता है फिर चाहे हो अपनी छवि कितनी भी साफ रखने की कोशिश क्यों न करे । भारत को दिशा देने वाले जो अच्छे नेता थे पिछले सात दशकों से सबको स्टैच्यू बनाकर टांग दिया गया लेकिन उनके विचारों को अपने दिल में रखने की मंशा से नही बल्कि वोट और पैसे कमाने का जरिया बना कर । यह बेवकूफी भरा काम एक दो नेता करते तो कोई बात नही थी लेकिन लगभग हर सत्तारूढ़ पार्टी ने ऐसा किया । उत्तर प्रदेश में मायावती को ही ले लीजिए, जगह जगह हाथी और भीमरावअम्बेडकर जैसे महान व्यक्ति की मूर्ति बनाने में करोड़ो का बजट खर्च किया मिला क्या सिर्फ पैसों की बर्बादी और वह भी जनता का पैसा । यही हाल अपने आप को उच्च छवि का नेता समझने वाले माननीय मोदी जी का भी है । सरदार पटेल की मूर्ति पर 3000 करोड़ खर्च किए और आज देश में ये स्थिति है कि लोगों को ऑक्सिजन और अच्छे हस्पताल तक नही मिल रहे । जिस देश के हजारों करोड़ रुपये सिर्फ एक रैली पर खर्च हो रहा है उसी देश में लोगों को हस्पतालों में बेड नही मिल रहे हैं, अफसोस ! ये किस दिशा में बढ़ रहा है देश । तमाम बड़े नेता और मीडिया दूसरे विकसित देशों की तुलना ऐसी जगह पर भारत से कर रहा की फलाने देश में भारत से भी बेकार हालात है, लेकिन कभी ये भी तो बताओं कि उन देशों में महज चुनाव के नाम पर हजारों करोड़ चुनावी रैलियों में नही उड़ाया जाता है, कभी ये भी तो बताओ कि वहां विधायक 15 से 20 करोड़ में खरीदे या बेचे नही जाते हैं, कभी ये भी तो बताओ कि उन देश में जनता से लिए टैक्स के पैसों के बदले में उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं निःशुल्क दी जाती हैं।

जिस देश में मात्र 400 रुपये सप्ताह के लिए लोग बिहार से बंगाल चुनावी रैली में पहुंच जाते है, उस राज्य की गरीबी पर चर्चा के लिए किसी के पास दो मिनट का समय नही है। लेकिन जब ऐसा ही व्यक्ति बीमारी में हस्पताल में महज एक बेड मांग ले तो नही मिलता, अफसोस । जनसँख्या नियंत्रण की कोई नीति क्यों नही है, यह चुनावी रैलियों को देखकर ही पता चलता है। कभी सोचा है इन रैलियों में कौन लोग होते हैं । कभी किसी सरकारी कर्मचारी को रैली में खड़ा पाया है (अगर वह व्यक्ति विशेष का जानकार न हो), या फिर किसी आईएएस- पीसीएस ऐसे व्यक्ति को जिसकी वहां ड्यूटी न हो । चुनावी रैलियों में सिर्फ वही लोग होते है जिनको जीवन भर केवल भीड़ का हिस्सा रहना है, महज 3% लग ही ऐसे होते हैं जो कोई राजनीतिक लाभ प्राप्त करते हैं । आपको एक मझेदार बात बताते हैं दुनियां भर में भारत ही ऐसा देश हैं जहाँ 80% कार्य केवल प्रचार से ही खत्म हो जाता है । उस वस्तु या व्यक्ति में दम कितना है ये कोई मायने नही रखता है। भारत ही दुनियां का अकेला ऐसा देश भी है जहां कम्पनियां वस्तुओं का वितरण भी अगल अलग राज्य में अलग अलग मानकों पर करती है । यहाँ शुद्धता कोई पैमाना नही है, सब पैसों और सोसाइटी का खेल है । उदाहरण के लिए दिल्ली में बिकने वाले मदर डेरी दूध और अन्य राज्य में बिकने वाले मदर डेरी दूध को ही ले लीजिए, बहुत अंतर है । जबकि अन्य देशोंके ऐसा नही है, जनता और नेता के लिए किसी वस्तु के मानकों में अंतर नही । सम्पूर्ण राष्ट्र में एक समान व एक गुणवत्ता की वस्तुओं का वितरण है ।

भारत में एडमिनिस्ट्रेशन फेलियर सबसे बड़ा मुद्दा है । मुनाफा खोरी इतनी है कि आप जीवन की अंतिम सांस के लिए जूझ रहे हो तो भी आपको ऑक्सिजन मुफ्त नही मिल सकती है । यही वजह है कि देश में वस्तु मानक के साथ छेड़छाड़ की जा रही है । क्योंकि सरकारें जनता से लिए टैक्स को यूँही अपनी अय्यासी में खर्च करती रहेगी और शुद्ध वस्तु का जो उचित मूल्य सरकार की आर्थिक मदद के साथ तय होना था वो होगा नही, फिर ऐसे ही फैसले सुनने को मिलेंगे कि "सरसों के तेल में पामऑयल मिलाकर 130 से 170 रुपये लीटर बेचिए क्योंकि शुद्ध सरसों का तेल तो 200 रुपये प्रति लीटर से अधिक पड़ेगा जिसकों आम जनता खरीद नही सकेगी- माननीय कोर्ट" इसीलिए यह जरूरी हो गया है कि जनता सुनिश्चित करे कि उसको देश में क्या चाहिए और क्या नही । मंदिर मस्जिद तो आज कोई मुद्दा रह ही नही गया है क्योंकि जीने के लिए हस्पताल चाहिए जो भगवान या खुदा नही देगा बल्कि राजनेता देगा और मझेदार बात क्या है पता है, उनको जनता ने ही चुना है । जनता को सिर्फ नेता से काम लेना है न कि उनकी भक्ति करनी है, ठीक जैसे अन्य विकसित देशों के नागरिक करते हैं ।