आज कल मीडिया में एक सवाल उठ रहा है कि आखिर उत्तराखंड निर्णय लेने में अक्षम क्यों हैं, क्यों वह अपने निर्णय अन्य राज्यों को देखकर ले रहा है। दरअसल यह सवाल कोरोना महामारी के दौरान लिए गये फैलसों को लेकर पूछा गया है। उत्तराखंड में जबसे त्रिवेंद्र रावत मुख्यमंत्री बने तबसे लगातार उत्तराखंड में जन हित में लिए जाने वाले निर्णयों को लेकर ऐसा प्रतीत हुआ कि मानों मुख्यमंत्री किसी के इशारों पर काम कर रहें हों। उत्तराखंड राज्य में इस दौरान वह शर्मनाक पल भी आया जब राज्य के मुख्यमंत्री सबसे फिसड्डी (नकारे) दिखाए गये वह भी राष्ट्रीय समाचार चैनल पर। सवाल यह है कि जिस राज्य में मानिसक तौर पर इतने समर्थ लोग निकलते हैं कि देश के प्रधानमंत्री को कोई देश दवाई ले लिए कच्चा माल देने से मना कर देता है और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (जो की उत्तराखंड का है) के कहने पर मान जाता है तो क्या राज्य की ऐसी स्थिति में आपको कोई लाचारी नजर नही आती ? और केवल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ही क्यों, तमाम वो लोग जो उत्तराखंड के हैं लेकिन देश-विदेशों में सर्वश्रेष्ठ पदों पर हैं, बताता है कि उत्तराखंड बौद्धिक तौर से बहुत शसक्त प्रदेश है। ऐसे में राज्य में त्रिवेंद्र और अब तीरथ रावत जैसे लोग जो जनता के हित में निर्णय लेने में असक्षम हैं, को मुख्यमंत्री बनाना भाजपा की सोची समझी साजिश नजर आती है।

राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य अपने निचले स्तर पर है, युवाओं को रोजगार के लिए कोई योजनाएं नही हैं। कोरोना में लागू हुई स्कीमें भी सरकारें ही डकार गई या अपने लोगों में ही बांट गई। केंद्र में बैठे नेता अपने बच्चों के नाम पर देहरादून में जमीनें खरीद रहें हैं, उत्तराखंड सरकार दे रही है। केंद्र सरकार अपने लाभ के उत्तराखंड का पर्यावरण नष्ट कर रही है, उत्तराखंड सरकार चुप है। अब इस गूंगेपन की वजह से उत्तराखंड की धूमिल होती ईमेज का जिम्मेदार माने तो किसको ? बाते आम जनता की समझ से दूर हैं इसलिए जनता को भाजपा में कोई कमी नजर नही आ रही है लेकिन एक समय आएगा जब थोड़ा थोड़ा समझ आएगा लेकिन उस वक्त तक जनता को कुछ करने लायक छोड़ा ही नही जाएगा। भाजपा ने जनता को मानसिक विकलांगता की ओर धकेल दिया है ऐसा सिर्फ उत्तराखंड में नही हुआ है बल्कि सम्पूर्ण उन राज्यों में यही स्थिति है जहां भाजपा की सरकारें हैं। खामियाजा उत्तराखंड ज्यादा भरेगा क्योंकि पहले से संसादन कम हैं और जो हैं भी वे भी बर्बादी की कगार पर खड़े हैं।

दरअसल प्रत्येक राज्य की अपनी अलग परिस्थितियां होती हैं जिसके तहत उसके नागरिकों का रोजगार निर्भर करता है। सुविधाओं का वर्गीकरण सभी राज्यों के लिए समान नही हो सकता है, अगर राजनीतिक कारण को हटा दें। प्रत्येक राज्य की अपनी भौगोलिक, पर्यावरण और जनजीवन स्थित अलग अलग होती है और इनपर अगर उचित ध्यान नही दिया गया या इनको ध्यान में रखकर सुविधाओं का वर्गीकरण नही किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को कई तरह के संकट से जूझना पड़ेगा। जिन लोगों ने उत्तराखंड राज्य के गठन को बारीकी से अध्ययन किया होगा तो उनको आज की स्थिति पर जी.बी. पंत जरूर याद आते होंगे। उत्तराखंड के निर्माण की वजह भौगोलिक जरूर थी लेकिन मंशा राजनीतिक थी, उत्तराखंड इससे बेहतर स्थिति में हो सकता था अगर कारणों में राजनीति नही होती।