उत्तराखंड का राजनीतिक समीकरण पूर्ण रूप से गड़बड़ाया हुआ है। जहाँ एक ओर सत्ता धारी भाजपा को अपनी साख बचने के लिए जूझना पड़ रहा है, तो पहले से राज्य में राज कर चुकी कांग्रेस को वापसी को लेकर बेचैनी बढ़ी हुई है। राज्य की जनता दोनों ही पार्टियों के कार्यकाल को भली प्रकार से देख चुकी है और जनता का कहना है कि दोनों ही पार्टियां विकास के एजेंडे पर फेल साबित हुई है। ऐसे में इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के पूर्ण बहुमत पर ग्रहण लगता नजर आ रहा है। राज्य गठन के समय से लेकर अब तक सत्ता से दूर रहा उत्तराखंड क्रांति दल इस बार एक मौके के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन उत्तराखंड क्रांति दल लोगों तक अपने विजन को पहुंचाने में विफल रहा है। इस बार उत्तराखंड क्रांति दल ने अपनी सक्रियता बढ़ाई है जिसका फायदा होता पार्टी को नजर आ रहा है। इस बार के एजेंडा में उत्तराखंड क्रांति दल कुछ क्षेत्रों में यह बात पहुचाने में सक्षम रहा है कि अगर क्षेत्र का विकास करना है तो क्षेत्रीय दल का आगे बढ़ना बेहद जरूरी है। ऐसे ही कुछ क्षेत्रों का जब हमने सर्वे किया तो रुझान चौकाने वाले निकले, जिस आधार पर ये रिपोर्ट लिखी गई। कुमाऊँ की कुछ सीटों पर यूकेडी की अच्छी पकड़ नजर आ रही है, वहीं गढ़वाल में चमोली और टिहरी जिले में भी पार्टी अच्छी स्थिति में नजर आ रही है।

कुमाऊँ में सर्वाधिक नुकसान भाजपा को होता नजर आ रहा है। यहाँ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच टक्कर देखने को मिल सकती है। राज्य में पहली बार चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी गढ़वाल मण्डल में तो कुछ खास करती नजर नही आ रही है लेकिन कुमाऊँ मण्डल में पार्टी का शुरुआती रुझान अच्छा नजर आ रहा है। गढ़वाल में भाजपा का कुछ प्रतिशत वोट आम आदमी पार्टी को जाता दिख रहा है जबकि कांग्रेस का वोटर यूकेडी की तरफ मुड़ता नजर आ रहा है। कुमाऊँ में भी भाजपा का अधिकांश वोटर आम आदमी की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है, जबकि कुछ सीटों पर भाजपा के प्रत्याशियों के स्थान पर यूकेडी बाजी मार सकती है।

2022 विधानसभा चुनाव उत्तराखंड के लिए बहुत मायनों में खास होने वाला है। मुद्दे वही हैं लेकिन अब जनता जागरूक हो चुकी है। राज्य में बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार अहम मुद्दे हैं। युवा पूछ रहें हैं कि राज्य में छोटे बड़े मिलाकर 30 से अधिक बांध है, बांधों का पानी दूसरे राज्यों को बेचा जा रहा है और राज्य के कई गांव एक एक बून्द पानी के लिए तरस रहे हैं, बिजली की दरें आसमान छूँ रही हैं, सैकड़ो गांव सड़क सुविधा से जूझ रहे हैं, पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा भगवान भरोसे चल रही है और रोजगार का तो क्या ही कहने। राज्य का पढ़ा लिखा युवा खुद को ठगा महसूस कर रहा है, ऐसे में युवा इस बार केवल चुनावी वादे को लेकर वोट करेगा ऐसा होता नजर नही आ रहा है। यही वजह है कि युवा भी क्षेत्रीय दल व नेता पर ही भरोसा जता रहा है। राष्ट्रीय पार्टियों से जुड़े नेता तो फिर राष्ट्रीय ही हो जाते हैं जो बस चुनावी दिनों में ही दर्शन देते हैं। बाकी का मिजाज तो चुनाव परिणाम ही तय करेंगे।