निजी लैब द्वारा घर जाकर स्वयं आरटीपीसीआर सैंपल एकत्र कर जांच की दर 900 रुपये की गई है। वहीं, सरकारी अस्पतालों द्वारा निजी लैब भेज गए सैपल की जांच दर 400 रुपये होगी। सचिव स्वास्थ्य डा. पंकज कुमार पांडेय द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि प्रयोगशालाओं को सभी रिपोर्ट में सीटी वेल्यू अंकित करनी जरूरी होगी। प्रदेश में आरटीपीसीआर टेस्ट अब महंगा हो गया है। शासन ने निजी लैब में जांच दर 700 रुपये और घर आकर सैंपल लेने पर जांच दर 900 रुपये कर दी है। अभी तक यह दर क्रमश: 500 रुपये और 600 सौ रुपये थी। प्रदेश में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। सरकारी व निजी लैब पर टेस्ट को लेकर दबाव बढ़ गया है। जांच रिपोर्ट भी अब चार से पांच दिन में आ रही है।

शासन ने इसी वर्ष जनवरी में कोरोना संक्रमण की दर में आ रही कमी को देखते हुए आरटीपीसीआर जांच की कीमत घटा कर 500 रुपये कर दी थी। अब कोरोना संक्रमण तेजी से बढने के बाद जिस तरह से सरकारी व निजी लैब में जांच बढ़ी हैं, उससे जांच किट की कीमतें बढ़ गई हैं। इसे देखते हुए स्वास्थ्य महानिदेशालय ने इसी माह शासन को एक प्रस्ताव भेजकर आरटीपीसीआर की दरों में बढ़ोतरी करने का अनुरोध किया। इसे शासन ने शनिवार को मंजूरी दे दी। इसके तहत निजी चिकित्सालय द्वारा निजी लैब को सैंपल भेजने अथवा व्यक्ति द्वारा लैब में जाकर आरटीपीसीआर टेस्ट कराने की दर 700 रुपये कर दी गई है।


पिछले आठ दिन से एंबुलेंस का किराया तय करने का प्रस्ताव परिवहन मुख्यालय में ही अटका हुआ है। कोरोना जैसी महामारी में जब एंबुलेंस संचालक पूरे प्रदेश में मनमानी पर उतारु हैं , ऐसे समय अफसरशाही का यह उदासीन रवैया पूरे सरकारी सिस्टम पर सवालों खड़ा करने के लिए काफी है। एंबुलेंस का किराया और श्रेणी तय करने को लेकर आरटीओ संदीप सैनी की अध्यक्षता में गठित टीम ने पिछले माह तीस अप्रैल को प्रस्ताव तैयार कर परिवहन मुख्यालय भेजा था। एंबुलेंस को सुविधा व तकनीक के हिसाब से तीन अलग श्रेणी में बांटा गया है। दस किमी व इससे ऊपर की दूरी के लिए इनका किराया तय करने समेत प्रतीक्षा शुल्क, रात्रि शुल्क व 200 किमी से ऊपर किराया तय करने का प्रस्ताव शामिल है। दरअसल, एंबुलेंस का किराया अभी तक उत्तराखंड में तय ही नहीं हैं। यही वजह है एंबुलेंस संचालक मनमाफिक किराया वसूल रहे हैं। शासन ने इस मामले में दून के जिलाधिकारी डा. आशीष कुमार श्रीवास्तव को एंबुलेंस संचालकों की मनमानी पर अंकुश लगाने व उनका किराया तय करने के आदेश दिए थे। जिलाधिकारी ने आरटीओ प्रवर्तन को यह जिम्मेदारी सौंपी। अब यह मसला राज्य परिवहन प्राधिकरण की बैठक के लिए अटका हुआ है।