अपने ही देश में अपने ही नागिरकों के लिए दायित्व का निर्वहन करते हुए राजनीतिक दल का कोई व्यक्ति इस तरह से मदद कर रहा है कि मदद से ज्यादा उसकी पब्लिसिटी पर ध्यान हैं। प्राचीन समय में सुना था कि दान वही अच्छा होता है जो गोपनीय होता है लेकिन बदकिस्मती से पार्टी भांड को छोड़कर भारत में कोई भी कार्य जनहित में अब गोपनीय तरीकों से नही होता है। हम मजहबी दौड़ में इतने आगे निकल गये हैं कि हमें उन तमाम लोगों के धर्म पर चर्चा करने का समय नही है जो ऑक्सिजन भी लाखों में बेच रहे हैं। वजह ? क्योंकि हम यह देखना ज्यादा पसन्द करते हैं कि घिनौना कार्य करने वाले का धर्म क्या है। धर्म ही तय करता है कि आपकी खबर किस तरह से छपेगी और सुरक्षा आपके रुतवे से तय होगी।

कोरोना महामारी के इस दौर में अगर कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री अपनी जनता के लिए कुछ भी कर रहा है तो इसमें राजनीतिक फायदा ढूंढने की जरूरत क्यों है। ये आपका दायित्व है उस जनता के प्रति जिसके आप राजा हैं। राजा का चरित्र कैसा है इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जबसे देश के प्रधानमंत्री सादना में भी कैमरा लेकर बैठे, ये चलन सा हो गया है कि आम जनता अगर किसी को एक गिलास दूध भी दे रही है तो उसकी भी फोटो सोशल मीडिया पर विभिन्न प्रकार की हेडलाइन के साथ होती है। क्या मदद से ज्यादा ये सब प्रचार और प्रसिद्धि की भावना से किया जा रहा है ?  

भारत की राजनीतिक गतिविधियों के कारण अगर आप भारत के विकास को बारीकी से देखोगे तो पाओगे भारत पांच साल दो कदम आगे बढ़ाता और और अगले साल पांच कदम पीछे आ जाता है। जानते हैं क्यों ? क्योंकि हमारी भावनाएं विकास से ज्यादा दिखावे पर टिकी हुई हैं। हमे विश्व गुरु बनना नही है बस दिखना है। ये कुछ ठीक उसी तरह है कि हमें पेड़ हरा दिखना चाहिए और उसके लिए हम उसके पत्तों को सींच रहे है बजाय चुपके से उसकी जड़ को पानी देने के। यही हो रहा, लेकिन आप इसको स्वीकार नही करेंगे क्योंकि हमें बस किसी तरह दिखना है।  

लोकतांत्रिक देश की एक ही खूबसूरती है और वह है सरकार की आलोचना, न की सरकार या राजनीतिक व्यक्ति का समर्थन। मान लो आपने एक बहुत आकर्षक फोन खरीदा लेकिन वह बीच बीच में हैंग करता है तो क्या आप उसके साथ खुश रहते हैं। नहीं, जबकि वह 90% सही चलता है फिर भी आप दूसरों को कहते हैं भाई इस फोन को मत लेना। लेकिन जब आपके फोन सही चल रहे होते हैं तो आप केवल उस फोन के साथ खुश रहते हैं और बस उसे चलाते रहते हैं। क्या आप फोन की रुकावट को  गलत मानते हैं ? जबकि कम्पनी की प्रोडक्शन बहुत प्रभावित हो चुकी है। नहीं ! क्योंकि यही तरीका है जो कम्पनी को बता सकता था कि इसमें कुछ कमी है। ठीक यही लोकतांत्रिक देश को चलाने का तरीका है, आलोचना बहुत जरूरी है । लेकिन 2014 से आलोचना हो ही नही रही है और हो रही है तो उनको हटाने का पूरा प्रयास हो रहा है। जबकि जिन कार्यों का दायित्व सरकार का है या किसी व्यक्ति का उस पर पब्लिसिटी हो रही है। तो सवाल पूछिए क्या हम सिर्फ दिखावे में जीना ही पसन्द करेंगे और अचानक बनने वाली खराब परिस्थितियों में यूँही लड़खड़ाते रहेंगे