भाजपा सरकार का विकास का नारा देश से लेकर राज्यों तक कहीं नजर नही आ रहा है। बड़े राज्यों को व्यवस्थित करने में समय लग सकता है क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में वैक्सिनेशन जैसी सुविधाओं को पूरा करने में थोड़ा लंबा समय लग सकता है लेकिन उत्तराखंड जैसा राज्य जिसकी कुल जनसंख्या लगभग 1.17 करोड़ के आसपास है, में हालात इतने खस्ता हैं कि हर रोज लोग कोरोना से दम तोड़ रहे हैं। 01 मई से टीके की घोषणा के बाद कई स्थानों पर वैक्सिनेशन सेंटर ही उपलब्ध नही हैं। मुद्दे आज भी वहीं पे अटके हुए हैं जहां से राज्य की शुरुआत हुई थी। राज्य में कांग्रेस ने भी लंबे समय तक राज किया लेकिन कांग्रेस भी पहाड़ी क्षेत्र के विकास में फेल ही साबित हुई है। यही वजह थी कि लोगों को भाजपा सरकार से बहुत उम्मीदे थी लेकिन इनकी स्थिति को देखते हुए लगता है कि पहाड़ी क्षेत्र पहले से चार गुना पिछड़ गये हैं।

तीन तीन जिलों पर एक हस्पताल चल रहा है। मझेदार बात ये कि मेडिकल कॉलेज होने के बाद भी सभी विभाग उपलब्ध नही है। एमआरआई जैसे साधारण सी टेस्टिंग के ऋषिकेश या देहरादून आना पड़ता है। चमोली, टिहरी और पौड़ी की स्वास्थ्य सेवाओं में समर्पित श्रीकोट-श्रीनगर मेडिकल कॉलेज का हाल क्या है, किसी से छुपा नही हुआ है। डॉक्टरों के नाम पर पूरा स्टाफ नही है तो पढ़ रहे छात्र ही मरीजों का इलाज करते हुए कई बार देखे गये हैं। सोचिए अगर इन्हीं तीन जिलों में स्थिति गम्भीर हो जाए तो मरीज कहां जाए ? क्या 10-20 बेड वाले हस्पताल इस बीमारी को थाम सकते हैं और ऐसे हस्पताल भी कितने हैं जिनमे बेड़ो की संख्या 10 हो पहाड़ी क्षेत्र में ? फिर भी विकास दिख रहा है तो आप जरूर भाजपा या अन्य दलों के चाटुकार ही हैं।

जीवन की मूल बहुत सुविधाएं स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार लेकिन इनकी स्थिति क्या है? पूछिए न कभी नेता जी से। पिछले 05 या 10 वर्षों में पहाड़ी क्षेत्र में कितने स्कूल खुले या स्कूलों में घटती छात्र संख्या के लिए क्या नीतियां बनी ? कितने पूर्ण सविधा युक्त हस्पताल सरकारों ने खोले ? कितने पहाड़ी युवाओं को रोजगार मिला ? कहां हैं आंकड़े। हाँ, सड़क और रेल लाइन का कार्य हुआ लेकिन वह राज्य सरकार की नही केंद्र की योजना है और टोल टैक्स लगाकर उसका भुगतान जनता कर ही देगी। लेकिन सवाल तो ये है कि राज्य सरकार कर क्या रही है, क्यों लोगों को मुद्दों से भटकाया जा रहा है। राज्य सरकार का दायित्व क्या है ? विकेंद्रीकरण का मतलब क्या था, क्यों राज्य बनाने कि जरूरत हुई ? क्या इस सब का कोई महत्व नही है ?

शर्म करो राज्य के नेताओं, महज 01 करोड़ जनता का टीकाकरण पिछले एक साल से नही हो पाया। यही वजह है कि न्यूज चैनलों पर उत्तराखंड की सारे आम ये कहकर बेजती की जाती है कि निर्णय लेने में सबसे फिसड्डी राज्य उत्तराखंड हैं। पिछले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत जी ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया था। आज सत्ता से बाहर हैं तो ज्ञान बांटते फिर रहे है लेकिन जब सत्ता में थे उस वक्त शून्य पर आउट हो गए। सरकार एक मुद्दे पर विफल हो तो जनता सहन कर ले लेकिन यहां तो स्थिति ऐसी है की सरकार को मुद्दे ही नजर नही आते फेल और पास तो बाद की बात है।

हम उत्तर प्रदेश से ये कहकर अलग हुए कि भौगोलिक स्थिति के कारण लखनऊ से पहाड़ी क्षेत्र का संचालन सम्भव नही। लेकिन आज 20 वर्ष पूरे हो गये सवाल वही रहा कि देहरादून से पहाड़ी क्षेत्र का विकास सम्भव नही। क्या आपको लगता है गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी से स्वतः विकास हो जाएगा ? जी नही ! उत्तराखंड विवेकहीन नेताओं का गढ़ बन चुका है। यकीन नही हो तो पूछ लीजिए अपने शिक्षा मंत्री से स्कूलों की स्थिति सुधारने की क्या रणनीति है, स्वास्थ्य मंत्री से पूछिये पहाड़ी क्षेत्र में हस्पतालों के हालात इतने खरब क्यों है ? हमे पूरा विश्वास है कि जवाब वही मिलेगा जो पिछले 10 सालों से घसीटा जा रहा होगा। समस्या यही है, विवेकहीन लोग नेतृत्व में हैं और जनता के बीच में आम वार्ता में नेता अब दिलचस्पी दिखाते नही क्योंकि जिसने दो बार की विधायकी कर ली वो तो अपने को शहनशाह समझता है। लेकिन सच ये है कि महज 01 करोड़ जनता जिसको पिछले एक साल में टीका नही लग सका, यही विकास हुआ है।