उत्तराखंड राज्य में निजी क्षेत्र नौकरियों के लिए बहुत बड़ा अभाव है। राज्य में कहीं भी बड़ी इंडस्ट्री नही है ऊपर से राज्य में रामदेव जैसे लोग और बैठे हुए हैं जो कमाने के लिए तो उत्तराखंड की जमीन का उपयोग करते हैं लेकिन रोजगार दूसरे राज्यों के युवाओं को देते हैं। क्या सरकार को यह तय नही करना चाहिए कि उत्तराखंड की सभी निजी कम्पनियों में 70% कर्मचारी उनकी योग्यता अनुसार उत्तराखंड के होने चाहिए ? हर राज्य अपने मानकों को लेकर चलता है फिर उत्तराखंड राज्य युवाओं के साथ अनदेखी कैसे कर सकता है। किसी भी राज्य में अगर कोई विकास कार्य भी सरकार करवाती है तो स्थानीय लोग पहले ही तय कर लेते हैं कि इतना प्रतिशत क्षेत्र का नागरिक इस प्रोजेक्ट का हिस्सा रहेगा। फिर उत्तराखंड में रोड, रेल जैसे प्रोटेक्ट पर युवाओं की अनदेखी क्यों ?

राज्य में निजी क्षेत्र में नौकरी का उचित समाधान न होने के कारण अधिकांश युवा कोचिंग की मदद से अपने भविष्य संवारते हैं। और उनके सपनों को सच करने के लिए हाजरों युवा दिन रात मेहनत कर पढ़ाते हैं और अपनी आजीविका सुनिश्चित करते हैं। लेकिन पिछले एक वर्ष से यह क्षेत्र भी बुरी तरह से प्रभावित है। वजह है कोरोना महामारी। उत्तराखंड सरकार ने इस दिशा में पिछले एक साल से कोई ध्यान नही दिया, शायद सरकार को राज्य के युवाओं के भविष्य की चिंता नही है। सरकार को उन हाजरों घरों की चिंता नही है जो राज्य के लिए युवा शक्ति को सही दिशा में बढाने का काम कर रहे हैं।  

हैरानी तो तब होती है जब सरकार खुद ही ये तय कर लेती है कि राज्य में कुम्भ चलेगा लेकिन शिक्षण संस्थान नही। क्या सरकार ने उन लाखों युवाओं से पूछा कि आप बेरोजगार मरना पसन्द करेंगे या नौकरी के बाद ? फिर आपने खुद ही यह तय कैसे किया कि कुम्भ से कोरोना नही फैलेगा और महज 15 से 20 बच्चों के एक कक्षा में बैठने से कोरोना फैल जाएगा। बड़ी मुश्किल से तो राज्य में नौकरी पर विज्ञापन निकलते हैं। युवा बड़ी दूर दूर से आकर शिक्षा ग्रहण करते हैं कि शायद इस बार ही सही, मेरी नौकरी का कुछ तो बने। सरकार का क्या है कल ही कोरोना से स्थिति सामान्य हुई नही कि कह देगी फलानी तिथि को परीक्षा होगी। लेकिन छात्र का क्या ? उसकी तो आपने शिक्षा ही रोक दी, शिक्षक का क्या उसका तो आपने रोजगार ही छीन लिया?

पूर्व मुख्यमंत्री से किसी को आश नही थी लेकिन अब तीरथ सिंह जी आप तो जागिए। लोगों के घर कैसे चलेंगे ? बहुत से कोचिंग सेंटरों के अध्यापक तो मिलकर भवनों का किराया ही भर रहे हैं। अगला एक वर्ष तो उसकी भरपाई कर पाना भी सम्भव नही है। कम छात्र संख्या के साथ और उचित दूरी के साथ कोचिंग को चलाने में क्या समस्या थी ? जबकि कुम्भ हाजरों लोगों एकत्रित किए हुए था। सब को जानकारी है कि इस समय जीवन खतरे में है फिर भी लोग रोजीरोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि अगर ऐसा नही किया तो भूखे मर जाएंगे। केवल शिक्षक ही नही बल्कि तमाम वो विद्यार्थी भी आपने भविष्य के लिए संघर्ष करे हैं कि नौकरी न मिली तो अंत में मरना तो वैसे भी है। पहाड़ समीक्षा राज्य के तमाम युवाओं से अनुरोध करता है कि अगर किसी शिक्षक ने कोरोना के दौरान कोचिंग चलाया है और पुलिस उसको पकड़ कर ले गई है तो समर्थन में खड़े रहें।  क्योंकि कल आपके साथ भी यही होगा अगर सरकार अपनी जिम्मेदारी नही समझेगी।