आगामी वर्ष 2022 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में कोरोना चुनावी रैलियों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। राज्य की भौगोलिक स्थिति और संसाधनों पर नजर डाले तो 18 से 44 वर्ष के युवाओं के टीकाकरण की राह इतनी आसान नही है। बंगाल चुनाव से केंद्र की सरकार को ये सीख ले लेनी चाहिए कि जनता की सुरक्षा उसका पहला कर्तव्य है न की चुनाव। राज्यों में टीकाकरण करना इतना आसान नही है जितना कि ये कह देना की 01 मई से टीकाकरण शुरू किया जाएगा। पहली चुनौती तो टीके को लेकर ही है और अगर टीका मिल भी गया तो उसको गांव गांव तक पहुंचना एक बहुत बड़ी चुनौती है। ऐसे में सरकार के आगे दो ही विकल्प हैं या तो टीकाकरण बहुत तेजी से साथ किया जाय या फिर चुनाव को छः माह की देरी के साथ शुरू किया जाय। ऑनलाइन चुनाव भी उत्तराखंड जैसे राज्य में सम्पन्न करवाना इतना आसान कार्य नही है क्योंकि राज्य के पहाड़ी क्षेत्र संसाधनों के भारी अभाव के चलते इतने जागरूक नही हैं कि ऑनलाइन प्रक्रिया से मतदान सम्पन्न किया जा सके।

आज जो राज्य कि स्थिति उसे देखते हुए राज्य में भीड़ का एक जगह एकत्रित होना किसी आत्महत्या से कम नही होगा। राज्य सरकार 80 से 120 तक आंकड़ा हर 24 घण्टे में मृतकों का बता रही है लेकिन हस्पतालों से मिलने वाले आंकड़े और घाटों पर जनले वाले शव कुछ और ही बयान कर रहें हैं। जनकारों की माने तो सरकारी आंकड़े झूठे हैं क्योंकि वह सिर्फ उन्ही मौतों को गिन पा रहें हैं जो सिस्टम की पकड़ में आते हैं लेकिन ऐसे कई लोग हर रोज कोरोना से मर जाते हैं जिसको हस्पतालों में दाखिला ही नही मिलता और वह बिना इलाज के ही सिस्टम की गिनती में आये बिना ही दम तोड़ देते हैं। ऐसे में कोरोना वैक्सीन की सुनिश्चितता कितनी जरूरी हो जाती है ये आप भली प्रकार से समझ सकतें हैं। हालांकि कोरोना टीके के बाद भी सावधानी की बहुत जरूरत है लेकिन अब तक प्राप्त आंकड़ों के आधार पर ये देखा गया है कि ऐसे लोगों में यह वायरस ज्यादा प्रभावी नही है।

उत्तराखंड में अभी कई तरह की अफवाहों का बाजर गर्म है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के छात्र तरह तरह की खबरें लोगों तक फैला रहें लेकिन उनमें सच्चाई नजर नही आ रही। ऐसी ही एक खबर 15 दिन का लॉकडाउन को लेकर चलाई जा रही है। लॉक डाउन कोरोना नियंत्रण में कारगर साबित हो गया इसमें कोई दोहराई नही है लेकिन लॉक डाउन साप्ताहिक होना चाहिए और बीच में कुछ दिन की ढील के बाद पुनः साप्ताहिक होना चाहिए। ढील क्षेत्र के हिसाब से होनी चाहिए अर्थात एक दिन किसी क्षेत्र का मार्केट खुले तो दूसरे दिन किसी और क्षेत्र का जिससे लोग अपनी जरूरत की वस्तुओं की खरीददारी कर सकें। एक साथ बन्द से लोगों की समस्याओं में इजाफा होता है और जब लॉक डाउन खुलता है तो भीड़ एकत्रित हो जाती है। जनता को भीड़ से जनता को बचाना ही इस समय में सरकार का उद्देश्य होना चाहिए। इसी कड़ी में आगामी 2022 का चुनाव भी नजर आ रहा है जिसको भीड़ से बचाकर सम्पन्न करना ही एक मात्र विकल्प नजर आ रहा है क्योंकि वैक्सिनेशन इतने कम समय में होना सार्थक प्रयास नजर नही आ रहा है। ऐसे में सरकार को चुनाव को पीछे करना या बिना रैलियों के पोलिंग बूथ तीन गुना बढाकर करवाना नही बेहतर विकल्प नजर आता है। चुनावी रैलियों में खर्च होने वाला पैसा पोलिंग बूथ संख्या पर खर्च होगा तो इससे कोरोना संक्रमण की दर में इजाफा देखने को नही मिलेगा।